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सोमवार, 23 नवंबर 2009

झारखंड:शिबू सोरेन अब भी ताकतवर नेता

"बहुत दम बाकी है इस बुढे शेर मे!!"

कोई गुरू कहता है तो कोई गुरूघंटाल.आदिवासियो का एक तबका उन्हे दिशोम गुरू मानता है तो एक तबका झारखण्ड का सौदेबाज.आखिर उग्रवाद और भ्रष्टाचार का प्रर्याय बने इस बदहाल नवप्रांत के सबसे बडे कद्दावर नेता की क्या है सही तस्वीर.


जी चौंकिये मत! बात है झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) सुप्रीमो शिबू सोरेन की. एक सुदूर देहाती जंगली गांव से तीर-धनुष के बल भीषण संघर्ष करते हुये भारतीय संसद मे मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने वाले इस शख्सियत को आज की तारीख मे भी कोई नजरन्दाज नही कर सकता.यदि इनमे धैर्य होता और पेण्डुलम की तरह कभी कांग्रेस-कभी भाजपा की ओर नही डोलते तो आज ये किसी अन्य राजनीतिक दल के मोहताज नही होते.


वेशक गुरूजी के नाम से चर्चित शिबू सोरेन आसन्न विधानसभा चुनाव मे एनडीए या यूपीए से इतर एकला चलो की रणनीति अपनाकर वे खुद ये टटोलना चाहते है कि अब तक उन्होने कितना खोया है और प्रदेश मे उनकी क्या औकात बची है.क्योकि वे मुख्यमंत्री पद पर रहते हुये तमाड विधानसभा उपचुनाव मे एक निर्दलीय प्रत्याशी से करारी हार से उबरे भी थे कि अचानक उन्हे अपने राजनीतिक उतराधिकारी पुत्र नलिन सोरेन की रहस्यमय मौत का सदमा झेलना पडा. इस हालिया दुर्दिन भरे दिन मे श्री सोरेन को पंगु बूढा खिलाडी मानते हुये उन्हे अपने हाल पर छोड दिया.


अब सबाल उठता है कि आसन्न विधान सभा के इस आम चुनाव मे सभी सीटो पर किस्मत आजमा रहे गुरूजीकी पार्टी झामुमो का प्रदर्शन कैसा रहेगा तो एक बात बिल्कुल साफ है कि वे चुनाव परिणाम बाद भले ही अकेले दम पर सरकार बनाने की कूबत मे हो लेकिन, सौ फीसदी संभावना है कि उसके समर्थन या फिर नेत्रीत्व के वगैर सरकार सरंचना संभव नही है.राजनीतिक विश्लेषक मानते है कि इस बार झामुमो को 18-25 सीटे मिल सकती है.



अब झारखण्ड मे कांग्रेस का नया खेल सुरू

बाबूलाल मरांडी बनेगे राज ठाकरे!

कांग्रेस ने झारख्ण्ड मे जेवीम सुप्रीमो व पूर्व मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल मरांडी को उस नये मुखौटे मे पेश करना शुरू कर दिया है,जिसका अन्देशा पहले से था.प्रांत के इकलौता सांसद व केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने पार्टी की कथित महारानी सोनिया गान्धी तथा युवराज राहुल गान्धी के चुनावी दौरे के बाद जिस तरह के बयान देने शुरू किये है,उससे एक बडी आबादी सहम सी गई है.उल्लेखनीय है कि आसन्न विधानसभा चुनाव मे कांग्रेस ने जेवीम के साथ गठबन्धन किया है.

श्री सहाय ने डोमिसाईलयानि स्थानियता जैसे संवेदनशील मुद्दे के कट्टर समर्थक श्री मरांडी को क्लीनचीट देते हुये ईमानदार व विकासपरक नेता करार दिया है.राजनीतिक विशेष्लेशक बताते है कि कांग्रेस ने ये तेवर सोनिया-राहुल की उस चुनावी सभा के बाद अपनाई है, जो ज्यादा कारगर होते नही दिख रहे है. ऐसे मे आदिवासी समुदाय के वोट को झामुमो तथा अन्य स्थानीय दलो के कब्जे से खींचने हेतु यह नया फार्मूला ईजाद किया है.

कांग्रेस का मानना है कि जिस तरह से महाराष्ट्र मे शिव सेना सुप्रीमो बाल ठाकरे को कमजोर करने मे मनसे नेता राज ठाकरे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, ठीक उसी तरह झारखण्ड मे बाबूलाल मरांडी को समर्थन दिया जाय. जिससे आगे की राजनीति मजबूत हो सके.

याद रहे कि बिहार राज्य से जब अलग होकर झारखण्ड राज्य का निर्माण हुआ,तब भाजपा ने श्री बाबूलाल मरांडी को ही मुख्यमंत्री बनाया था.लेकिन सत्ता मे आते ही मरांडी ने बिहार का लालू यादव बनने की लालसा मे डोमिसाईलका मुद्दा छेड दिया.नतीजतन तब समुचा झारखण्ड प्रांत स्थानीयता वनाम बाहरी की आग मे जलने लगा.उस समय भारी जान-माल का नुकसान हुआ था.चूकि झारखण्ड शुरू से ही भाजपा का गढ रहा है,अतः येन-केन-परक्रेण कांग्रेस अपना सिक्का जमाना चहती है.

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

बाल-राज ठाकरे देशद्रोही दिमाग वाले : नीतीश कुमार

केन्द्र सरकार शीघ्र कडे कदम उठाये
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाषा और क्षेत्र की राजनीति करने वाले चाचा-भतीजा यानि बाल ठकरे-राज ठकरे पर कडी टिप्पणी करते हुये कहा है कि उन्होने कभी भी ऐसे लोगो को राजनीति करने वाले नही समझते. उन्होने हमेशा ऐसे लोगो को राष्ट्रद्रोही मानसिकता की परिधी मे रखा है.

उन्होने कहा कि वे एंनडीए मे ऐसे तत्वो का मुखालफ़त करते रहे है और भविष्य मे प्रमुख घटक दल भाजपा से इस मुद्दे पर सीधी बात करेगे क्योकि पानी अब सिर के उपर बहने लगा है. श्री कुमार ने एक सबाल के जबाब मे कहा कि अलगाववादी तत्वो का कोई बजूद नही होता, आये दिन देश मे जाति,धर्म,वर्ग,क्षेत्र,भाषा आदि की आड मे सिर्फ़ गडबडिया फैलाने का काम करती है.ऐसे तत्वो के खिलाफ देश को सजग रहना चाहिये.

उन्होने कहा कि बाल ठाकरे साहेब हो या उनका बिगडैल भतीजा राज ठकरे या फिर कोई और , केन्द्र सरकार को चाहिये कि भारतीय संविधान के तहत कडी कार्रवाई करे अन्यथा यह समस्या समुचे देश मे कभी भी बिकराल रूप धारण कर सकती है.

सोमवार, 16 नवंबर 2009

झारखण्ड:कौन बनेगा सीएम?तीसरी बार अर्जून मुण्डा!

तीसरी बार अर्जून मुण्डा! भारतीय जनता पार्टी ने झारखण्ड मे जिसे स्टार बना रखा है,वह है पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान सांसद अर्जून मुंडा. प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के बाद आपातस्थिति कहिये या आनन-फानन मे पार्टी के वरिष्ठ नेता कडिया मुंडा को एक बार फिर नजरन्दाज कर एक ऐसे नेता को पदभार दिया गया, जिसके पास न तो स्वतंत्र प्रशासनिक अनुभव था और न ही पार्टीगत जनाधार. श्री मुंडा की सबसे बडी काबलियत थी कि वे प्रदेश मे दूसरे नम्बर की पार्टी झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन की गोद से उछलकर अचानक आ गये थे.तब भाजपा को शायद यह लगा था कि वे अपने साथ झामुमो के युवाझुंड को साथ लाकर मजबूती प्रदान करेगे.लेकिन हुआ ठीक उलटा. आज तक वे पार्टी के लिये इस कदर मजबूरी बन गये है कि आसन्न विधानसभा चुनाव मे टिकट बंटबारे मे सिर्फ उन्ही की चली है.

आज आजादी के इतने वर्षो बाद भी वेहद बदहाल इस प्रदेश मे खरीद-फरोख्त और जोड-तोड की कूटनीति की शुरूआत करने का श्रेय अर्जून मुंडा को ही जाता है. निर्दलीय मधु कोडा मुख्यमंत्री बनककर लूटेरो की फौज खडी कर ली. उनके राज मे सबो ने खूब छक कर मधु पिया. दरअसल श्री कोडा ने लूटो,लूटवाओ और राज करो के गुर श्री मुंडा से ही सीखे थे.

भाजपानीत प्रदेश सरकार मे वे पांच साल तक मुख्यमंत्री रहे. इस दौरान उन्होने राज्यहित मे कई गलत व विवादास्पद फैसले किये.उधोग के लिये उन्होने 52 एमओयू किया लेकिन, धरातल पर एक भी न दिखा. नतीजतन वे पार्टी के एक गुट के अगुआ बन कर रह गये है.

इन्हे तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने मे दल के अन्दर ही प्रमुख दो प्रतिद्वन्दी प्रदेश अध्यक्ष रघुवर दास तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्री व सांसद यशवंत सिन्हा के राजनीतिक प्रहार झेलने होगे.

कौन बनेगा झारखण्ड का सीएम?

श्री बाबूलाल मरांडी! झारखण्ड जैसे बदहाल नव प्रांत की राजनीति मे बाबूलाल मरांडी का कोई सानी नही है.इनके राजनीतिक जीवन के भूतकाल का आंकलन करना उतना ही मुश्किल है,जितना कि भविष्यकाल का. कभी खाली बदन आरसएस की चौकी पर सो कर भाजपा की राजनीति करते थे और आज खुद का संगठन बना कर कांग्रेस के सोफ़ा पर आराम फरमाना चाहते है. राम मन्दिर जैसे मुद्दो को लेकर भाजपा के झारखण्ड मे एकछत्र सिक्का जमाने मे श्री मरांडी के योगदान को कोई नही भूल सकता.

लेकिन यह भी सच है कि भाजपा ने भी अपने इस कद्दावर नेता को इच्छाफल देने मे कोई कोताही नही बरती. जब मजबूरी मे ही सही तात्कालिक बिहारकिंग लालू प्रसाद यादव ने अलग झारखण्ड राज्य का गठन किया तो भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेता करिया मुंडा को नजरन्दाज कर सर्वप्रथम बाबूलाल मरांडी को ही मुख्यमंत्री बनाया. जब उन्हे इस पद से हटाया गया तो इसके कारण थे.

श्री मरांडी ने झारखण्ड का लालू बनने की लालसा मे डोमिसायल का मुद्दा जिस तरह से छेडा, उससे उससे समूचा प्रदेश स्थानियता वनाम बाहरी की आग मे जल उठा. ऐसी परिस्थिति मे भाजपा को उन्हे पद से हटाने के अलावे कोई चारा न था. उसके बाद जब केन्द्र मे भाजपानीत सरकार सतासीन हुई,तो पार्टी ने उन्हे कैबनेट मंत्री के पद से नवाजा. बाद मे भी उनकी हैसियत प्रदेश के कद्दावर नेता के रूप मे बनी रही. और आज ये आश्चर्यजनक पहलू है कि दोनो विपरित दिशा मे भाग रहे है.

आसन्न विधानसभा चुनाव मे दो-चार सीटे लाकर मरांडी कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी पर वे पकड बना लेगे, यह कहना बहुत मुश्किल है.वे कुछ हद तक ईमानदार व विकासपरक विचार के माने जाते है और है भी. लेकिन, उनमे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सरीखे धैर्य का निरंतर अभाव रहा है. चन्द लोगो से हमेशा घिरे रहना तथा स्थानीयता से प्रेम उन्हे राजनीतिक चौसर के प्रमुख से बाहर करती नजर आती है

रविवार, 15 नवंबर 2009

सही सलामत घर लौटे निवर्तमान राजद विधायक का राज

मौत के भय से उग्रवादियो को भारी लेवी दी!

नक्सली संगठन भाकपा माओवादी की झारखंड-छत्तीसगढ़ सीमांत कमेटी के दस्ते ने लातेहार राजद प्रत्याशी व मनिका के निवर्तमान विधायक रामचंद्र सिंह अपहरण के 18 घंटे बाद रिहा किये जाने का नया राज कुछ और ही उभरकर सामने आया है. प्राप्त जानकारी के अनुसार उक्त राजद नेता को नक्सलियो ने अपहरण कर करीव तीन-चार किलोमीटर दूर एक बडे उग्रवाद समर्थक बस्ती ले गये और वहा उनलोगो की पंचायत बैठी. इस बैठक मे पिछले दो बार से लगातार विधानसभा चुनाव जीतने के बाद तीसरी बार चुनाव मैदान मे उतरे राजद प्रत्याशी को संगठन द्वारा नामांकन पूर्व मांगी गई 30 लाख रूपये की लेवी राशि की बाबत सज़ा देने निर्णय लिया गया तो राजद प्रत्याशी ने तत्काल 12 लाख रूपये दिये और चुनाव जीतने के बाद शेष राशि चुकाने भरोसा दिया है.नक्सलियो द्वारा विधायक को यह भी निर्देश दिया गया है कि विगत संसदीय चुनाव मे जो राशि तात्कालीन कांग्रेस प्रत्याशी पूर्व सांसद रामेश्वर उरांव से मदद के लिये उक्त राजद नेता ने ली थी, वह तीन माह के भीतर लौटा दे. कहा जाता है कि श्री उरांव ने श्री रामचन्द्र से 45 लाख रूपये बसुलवाने के लिये ही नक्सलियो के दरवार मे गये थे,जो चनाव मे मदद करने की अवज मे दी थी. लेकिन उन्हे उक्त राजद नेता की ओर से अपेछित मदद नही मिले और वे चुनाव हार गये.

शनिवार, 14 नवंबर 2009

झारखण्ड विधानसभा चुनाव:हमाम मे सारे नंगे

इस बार और मिलेगा बद्दतर जनादेश!

विगत नौ साल मे छः मुख्यमंत्री का कारनामा झेल चुके झारखण्ड का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, करीब तीन करोड की आबादी वाले इस बदहाल प्रांत मे यह सबाल गांव की गलियो से लेकर राजधानी रांची की सत्ता के गलियारे मे तैर रहा है. हालांकि इस बार भी भाजपा सबसे बडी पार्टी के रूप मे उभरकर सामने आती दिख रही है,लेकिन इसे सत्ता से कोसो दूर ही रहने की संभावना कही अधिक दिखती है. अगर सत्ता तक पहुंचती भी है तो इसे काफी जोड-तोड की राजनीति करनी पडेगी और तत्पश्चात निर्मित सरकार भी ब्लैकमेकरो की ही मानी जायेगी. हालांकि इस बार अपने गठबंधन के प्रमुख घटक जद यू के विकासपरक नेता व पडोसी बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार को स्टार प्रचारक बनाने का लाभ मिलने की काफी उम्मीद है.

अनुमानतः 65 फीसदी भू-भाग पर भयंकर उग्रवाद समेटे इस कुशासित प्रदेश मे सत्ता का दुसरी प्रबल दावेदार जेवीम के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के के साथ गठबन्धन कर चुनाव मैदान मे उतरी कांग्रेस है. इस गठबन्धन से उसका प्रदर्शन पिछले चुनाव की तुलना मे कितना सुधरेगी, यह चुनाव बाद ही पता चल पायेगा. क्योकि उसने भाजपानीत अर्जून मुण्डा की सरकार को गिराकर एक निर्दलीय मधु कोडा की सरकार बनाई और फिर उसे हटाकर झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन को पहले मुख्यमंत्री बनाया और बाद मे एक सोची समझी रणनीति तमाड विधान सभा उप चुनाव मे हराकर मुख्यमंत्री पद से हटाया, यह बात किसी से छुपी नही है. खासकर मधु कोडा के शासनकाल मे जिस तरह से झारखण्ड को गिरवी रखकर सरकारी खजाने को लूटा गया,इससे कांग्रेस अपना दामन पाक-साफ़ नही रख सकती. उसे गली-मोहल्ले तक जबाब देना होगा. इसका खामियाजा जेवीएम पार्टी और उसके नेता बाबूलाल मरांडी को भी भुगतना पडेगा. उनसे भी लोग ये सवाल खूब करेगे कि अखिर क्या बात है कि प्रदेश की बदहाली के लिये कांग्रेस को जिम्मेवार होने का ढिढोरे पिटते न अघाने वाले इस मौकापरस्त नेता ने अपनी एकला चलो की राह क्यो बदल ली? झारखण्ड मे डोमिसाईल लागू करने के मुद्दे पर मुख्यमंत्री की कुर्सी खोने तथा पुनः पुराना तरजीह न मिलने के कारण भाजपा छोड जेवीम नामक नई पार्टी बनाने वाले इस नेता के प्रति राज्य की करीब 47% आबादी को भय है कि कांग्रेस कही इन्हे यहा का राज ठाकरे न बना डाले.

अब सबाल जहा सता के तीसरे दावेदार झामुमो सुप्रीमो शिबु सोरेन का है तो सता के खातिर उन्होने पिछले डेढ दशको से जिस तरह से पेंडुलम बनने का कार्य किया है और केन्द्र सरकार मे मंत्री तथा कुछ दिनो तक मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी भी यह कलई खुल गई है कि वे प्रदेशहित से ज्यादा स्वहित को प्रशय देते है. ऐसे भी अब उनमे पहले जैसा वे तेवर नही रहे जिसके बल वे आदिवासियो के कद्दावर नेता माने जाते थे. फिर भी इन्हे आसन्न चुनाव मे इतनी सीटे अवश्य मिलने की संभावना है कि उनके समर्थन या उनके नेत्रित्व के वगैर सरकार बनाने वालो को काफी एडी-चोटी एक करना होगा.

राजद सुप्रीमो लालू यादव भी यहा अपनी ताकत बढाने की पूरजोर कोशिश करेगे. यदि वे अपनी पूर्व के प्रदर्शन को दोहरा ले तो एक बार फिर किंगमेकर की भूमिका मे नजर आ सकते है.

ऐसे तो बन्धु तिर्की,एनोस एक्का,मधु कोडा जैसे निर्दलियो की हेकडी इस चुनाव के बाद समाप्त होनी तय है.लेकिन आजसू सुप्रीमो व युवातुर्क नेता पूर्व होम मिनिसटर सुदेश मह्तो ने जिस तरह से अन्य दलो के नेताओ को मिलाकर एक टीम चुनाव मैदान मे उतारा है. पूरी संभावना है कि सता की सरंचना इनके आसपास भी घुमेगी.

बहरहाल, सच पूछा जाय तो झारखण्ड मे हर जगह अभी चुनाव से कही अधिक चर्चा मधु कोडा लूटराज-कांड की चल रही है.जिसे हमाम मे सब नंगे रहे राजनीतिक दलो ने भी मतदाताओ के बीच अपना दामन पाक-साफ बताने के लिये सबसे प्रमुख मुद्दा बना लिया है.

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

झारखण्ड:कोडा लूट-राज की जांच करने वालो के परिवारो पर आफत शुरू

इनकम टैक्स इंसपेक्टर के पुत्र को सरेआम अधमरा किया
झारखण्ड प्रांत मे अरबो-खरबो रूपये के कोडा लूट-राज की जांच कार्य मे सघनता से जुटे आयकर अधिकारियो तथा उसके परिवारो पर खतरा बढ गया है। जिस तरह से इस घपले घोटाले मे बडे-बडे नेताओ व माफियाओ की संलिप्तता की परते शनैः शनैः खुल रही है,त्यो-त्यो उन लोगो पर हमले तेज होने की पूरी आशंका है। बीते दिन कोडा लूट-राज की जांच कार्य आयकर विभाग के सीनियर इंसपेक्टर ए।के.मांझी के 14 वर्षीय पुत्र कुमार अभिषेक जमशेदपुर मे दो हमलावरो ने ने पीट-पीट कर अधमरा कर दिया, वह 10वी वर्ग का ट्युशन पढ कर अपने घर वापस लौट रहा था. अभिषेक के अनुसार हमलावरो ने उससे सिर्फ इतना पूछा कि क्या वह आयकर विभाग के सीनियर इंसपेक्टर ए.के.मांझी का पुत्र है? उसने जैसे ही येस कहा, हमलावरो ने उसे मारना-पीटना शुरू कर दिया और जब बेसुध होकर गिर पडा तो एक हमलावर ने एक बडा पत्थर उठाकर उसके सिर पर दे मारा. फिलहाल अभिषेक गंभीर हालत मे टाटा मेडिकल अस्पताल मे भर्ती है.

झारखण्ड : मामला राजद के निवर्तमान विधायक के नक्सली अपहरण का

शक की सूई पूर्व कांगेसी सांसद रामेश्वर उरांव की ओर
झारखण्ड के सर्वाधिक उग्रवाद प्रभावित लातेहार जिले के मनिका विधान सभा सीट के राजद प्रत्याशी तथा निवर्तमान विधायक रामचन्द्र सिन्ह का झारखण्ड-छतीसगढ सीमांत कमिटि के घातक हथियारो से लैस करीब 50 नक्सलियो ने उनके एक अन्य करीबी समर्थक सुरेश यादव के साथ अपहरण कर लिया है हालांकि कल देर शाम नक्सलियो ने अचानक धावा बोल कर कुल सात लोगो का अपहरण किया था,लेकिन उनमे से पांच को अपना समर्थक मानकर बाद मे मुक्त कर दिया है.
इस अपहरण की सूई कांग्रेस के पूर्व सांसद रामेश्वर उरांव की ओर घुमती नजर रही है,जिन्होने कल दिन दो बजे जिस जलसे का उदघाटन किया था,उस बैठक मे राजद प्रत्याशी रामचन्द्र बिन बुलाये शरीक होकर वापस लैट रहे थे. कहा जाता है कि विगत संसदीय चुनाव मे उरांव अपनी करारी हार का एक बडा कारण लगातार दो बार से चुनाव जीत रहे उक्त अपहरित विधायक को मान रहे थे. उल्लेखणीय है कि झारखण्ड के नेता एक दुसरे के खिलाफ नक्सलियो का इस्तेमाल भी खूब करते है.समाचार प्रेषन तक झारखण्ड-छतीसगढ पुलिस पूर्व विधायक मनिका के राजद प्रत्याशी की बरामदगी करने मे विफल रही है. नक्सलियो द्वारा उनकी हत्या कर देने की संभावना व्यक्त की जा रही है.

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

झारखण्ड मे पटना पुलिस हत्याकांड : खुलेगे कई राज

कुख्यात अपराधी नौषाद तीन दिनो की पुलिस रिमांड पर
विगत माह रांची जिले के ओरमांझी थानान्तर्गत ईरबा बस्ती मे छापामारी करने आयी पटना पुलिस पर कातिलाना हमला कर एक पुलिस जवान को मार डालने तथा तीन अन्य पुलिस जवान को अपंग करने की घटना का मुख्य आरोपी मो. नौषाद ने रांची जिला सत्र न्यायालय मे आत्मसमर्पण कर दिया है. जिसे आज ओरमांझी थाना ने तीन दिनो की पुलिस रिमांड पर लेकर पूछताछ कर रही है तथा पटना के सीनियर एस.पी. को फैक्स भेजकर मामले की अधिक गहन पूछताछ करने का अनुरोध किया है।उल्लेखनीय है कि चालक-खलासियो की हत्या कर वाहन चोरी की खरीद- बिक्री के गोरखधन्धे का सरगना बनकर एक- दो साल मे ही करोडपति बने मो.नौषाद को झारखण्ड पुलिस ने कई बार उसकी बस्ती मे छापामारी कर उसे पकडने की कोशिश की, लेकिन उसने अपने गुर्गो के साथ मिलकर हर बार खदेड दिया. गत 30 अक्तूबर को खुद पटना पुलिस की टीम स.अ.नि. सुरेन्द्र राय की अगुआई मे अपने तीन अन्य जवानो के साथ छापामारी करने आयी लेकिन इस बार आरोपियो ने हमला कर एक जवान की तलवार से काटकर हत्या कर दी तथा स.अ.नि. सहित दो अन्य को अपंग कर दिया. उसके बाद मुख्य आरोपी सरगना अचानक चर्चा मे आ गया. कहा जाता है कि मुलतः बिहार मे अपने कुकर्मो को अंजाम देने वाले इस सरगना को स्थानीय पुलिस व नेताओ का खुला समर्थन हासिल था. इसलिये उसकी अपराधिक दबंगता बढती जा रही थी.

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री चुप्प क्यों ?

बाल-राज ठाकरे की बढती राष्ट्रीय गुंडागर्दी
हाल मे ही चीन ने कहा था कि जल्द ही भारत कई टुकडो मे बंट कर एक से अनेक देशो मे बंट जायेगा। आज विश्व के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश के अनेक हलको मे जिस तरह के हालात दिख रहे है, काफी भय है कि कही चीन की भविष्य सच न हो जाये. सोवियत संघ रूस भी कभी एक मजबूत राष्ट्र था। लेकिन विदेशी ताकतो ने उसे भी भाषा, वर्ग,जाति,मजहब आदि के नाम पर तहस-नहस कर डाला।
बहरहाल , रूख करते है देश की फिल्म नगरी मुम्बई की ओर, जहा बाल ठाकरे और उसका भतीजा राज ठाकरे जैसा गुंडा रहता है. इन दोनो चाचा-भतीजा के जीवन पर प्रकाश डाले तो मात्र यही स्पष्ट होता है कि कम से कम ये दोनो मराठी मानुष की हित मे कोई राजनीति नही करता है बल्कि सिर्फ गुंडागर्दी करता है. इन दोनो के पास कोई राजनीतिक कार्यकर्ता नही है,बल्कि महाराष्ट्र के समाज के गुंडे है। कहने का अर्थ वे किसी राजनीतिक दल के मुखिया नही अपितु गुंडा गैंग के सरदार है.
कल राज ठाकरे के पूर्व घोषित ईशारे पर उसके गुंडे विधायको ने जो कुछ किया, वह भारतीय संविधान के तहत खुला देशद्रोह है. देश के विधान सभाओ मे मारपीट-तोडफोड की अनेक घटनाये हुई है लेकिन, उसके मुद्दे आपसी रहे है। राज ठाकरे ने जो मुद्दा उठाया है मराठी भाषा के जिस तरह से इस्तेमाल का हमारे राष्ट्रभाषा हिन्दी और उससे जुडे राष्टीयता का अंतिम अपमान है। इसकी कडी सजा मिलनी चाहिये। क्योकि उसके गुंडे विघायक ने राष्ट्रभाषा हिन्दी को लेकर विधानसभा के अन्दर एक विधायक अबु आजमी को तमाचा नही मारा है। हमारे संविधान को चुनौती है। इसकी हिफाजत की जबाबदेही एक आम नागरिक को तो है ही, सीधे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी इससे बच नही सकते. मेरी तो स्पष्ट मांग है कि बाल-राज जैसे चूहा-मेंडक को उसके बिल-कुआ से बाहर निकालो और सिर मुढाकर,उसके चेहरे कालिख से पोतकर, उसे गदहे पर बैठाओ. फिर उसे मुम्बई से समुचे देश मे घुमाओ और थूको भाजपा- कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलो के नेताओ के सामने,जिसने अपने राजनीतिक स्वार्थ मे आकर उन दोनो को आगे बढाया/बढा रहा है.

रविवार, 8 नवंबर 2009

प्रतिभा से सीखो और आगे बढो

देश के दो बडे राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस अपनी ताकत बढाने के लिये जिस तरह के गन्दा खेल खेल रही है,वह आने वाले दिनो मे क्या स्वरूप लेगा।यह तो भविष्य की बात है। लेकिन भाजपा ने पहले बाल ठाकरे और अब शिवराज को आगे कर जिस भावना को भडका रही है तथा कांग्रेस ने जिस तरह राज ठकरे के पिछे खडा होकर बिहार-झारखण्ड-यूपी वालो को लेकर जिस तरह के गन्दा खेल खेल रही है, वह आने वाले दिनो मे क्या स्वरूप लेगा. यह भविष्य की बात है. लेकिन इतना तय है कि भाजपा ने पहले बाल ठाकरे और अब शिवराज को अचानक तथा कांग्रेस ने राज ठकरे को आगे कर देश को जो मैसेज दे रही है , वह उन दोनो दलो के हित मे नही है.अब मै जो लिखने जा रहा हू ,वह उनलोगो को समझने के लिये काफी होगा जो देशहित से उपर स्थानियता को मानते है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक - पश्चिम बंगाल से गुजरात तक के लोगो को सझने के लिये काफी होगा। यदि जो लोग इसे नही समझते है,उन्हे मान लेना चाहिये कि वे मेहनत करने के बजाय भीख मांगने मे विश्वास करते है. कुछ दिन पहले झारखण्ड के एक बडे भाजपा नेता और एक जाने पहचाने कांग्रेस नेता एक नीजि समारोह मे बैठे थे. चर्चा चल रही थी कि झारखण्ड को अलग हुये एक दशक से उपर हो गये. लेकिन बिहारियो के कारण इस राज्य की दुर्गती हो रही है. उन दोनो नेता ने एकमत से कहा कि अभी राज्य के सरकारी गैर सरकारी छेत्र मे वे लोग ही काम कर रहे है. जबकि बंट्बारा के साथ ही सबको बदल देना चाहिये था. जब मैने उनसे पूछा कि क्या झारखण्ड मे इतनी प्रतिभा है , जो पूरी अर्थव्यवस्था को सम्भाल ले. ......मेरे इस पर वे दोनो बंगले झांकने लगे. मेरे कहने का अर्थ यह है कि जहा प्रतिभा की कमी होती है, वहा प्रतिभा पहुंचती ही है. देश–दुनिया के किसी भी हिस्से मे प्रतिभा का सम्मान होनी चाहिये.उसके गुण सीख कर आगे बढना चाहिये. राजनीतिक नेताओ के झांसे मे नही आना चाहिये.

बुधवार, 30 सितंबर 2009

"झारखण्ड:उग्रवादियों से सांठ-गांठ कर अपना प्रभाव है इसाई मिशनरियां"

- मुकेश कुमार -
झारखण्ड में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इसाई मिशनरियों ने उग्रवादियों से सांठ-गाँठ कर ली है। झारखण्ड के जिन क्षेत्रों में इनदिनों उग्रवाद चरम पर है, उन मूलतः आदिवासी बहुल क्षेत्रों में वे अपनी गतिविधियाँ तेज कर दी है। सूचना यह भी है कि एक भारी भरकम लेवी देकर इसाई मिशनरियां अपने विरोधियों पर तरह-तरह के झूठे गंभीर आरोप लगा उनका सफाया कर देते हैं।प्राप्त जानकारी के अनुसार झारखण्ड प्रांत के रांची,खूंटी , हजारीबाग, बोकारो, कोडरमा, सिंहभूम, लोहरदगा, चतरा, गुमला, रामगढ , गिरिडीह , देवघर आदि जैसे जिलों समेत पश्चिम बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा के सीमा से लगे जिलों में उग्रवादी संगठनें साशन-प्रसाशन पर इतना भारी है कि उनके समक्ष आत्मसमर्पण करने के अलावे कोई चारा नहीं है।
सच पूछिये तो अत्याधुनिक आर डी एक्स ,डायनामाईट , ऐ के-४७ , रॉकेट लांचर आदि जैसे विस्फोटक एवं स्व संचालित सेटेलाईट उपकरणों से लैस इन उग्रवादी संगठनों को एस।पी.,डी.एम्.,विधायक,सांसद से लेकर छोटे-बड़े विकास योजनाओं से जुड़े ठेकेदार जब खूब लेवी देते हैं तो फ़िर इन इसाई मिशानिरियों की बिसात क्या है। उन्हें तो पूर्णतः सुरक्षित एक ऎसी जमीन मिल जाती है ,जोकि एक स्वस्थ लोकतांत्रिक साशन व्यवस्था में बिल्कुल सम्भव नहीं है।

झारखण्ड उग्रवाद का दूसरा कुख्यात नाम

आज की तारीख में झारखण्ड की धरती की सबसे बड़ी समस्या उग्रवाद है। यह एक ऎसी समस्या है जिससे निजात पाये वगैर इस प्रान्त का विकास संभव नहीं है। चाहे सरकार कितनी भी जोर लगा ले। प्रसाशनिक राजनीतिक तंत्र में आज जिस तरह के उग्रवाद का खौफ नजर आता है ,वह यहाँ के किसी भी विकासशील व्यक्ति को अन्धकार में डूवो detii है

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

"शादी पूर्व ही यौन-सम्बन्ध स्थापित करने का आम प्रचलन है इस 'नव इसाई समुदाय' में "

- मुकेश कुमार-
भारत जैसे विश्व के सबसे लोकतान्त्रिक देश में अन्य राज्यों में आदिवासी समुदाय की हालत क्या है,यह एक गहन छानबीन का विषय हो सकतें हैं लेकिन झारखण्ड में सब कुछ उपरी सतह पर दिखता है.यहाँ आदिवासी समुदाय पूर्णतः तीन वर्गों में विभक्त हो गया है।
पहला वर्ग अलग राज्य गठन के बाद सत्तासुख भोग रहा है ।
दूसरा वर्ग वही पुराना दीन-हीन जीवन जीने को अभिशप्त हैं। तीसरा वर्ग ईसायत की चपेट में आकर एक ऐसा जीवन जीने लगा है जिसमें न तो झारखंडी संस्कृति बची है और न ही भारतीयता।सबसे पहले ईसायत की चपेट में प्रायः आदिवासी समुदाय की बालाएं आती है जो धीरे-धीरे पूरे परिवार-खानदान को अपनी रंग में रंग लेती है।
सच पूछिए तो इसाई मीशिनारियां ऎसी महत्वाकांक्षी बालाओं आर्थिक तौर पर इतनी मजबूत बना देती है कि उसका समूचा परिवार उसी पर निर्भर हो जाता है। अच्छे खासे रसूख वाले दूर-देहात के भोले -भाले आदिवासी युवक भी आधुनिक चकाचौंध में आकर आसानी से इनके गले बंध जाते हैं । मूल आदिवासी से बने इस नए इसाई वर्ग में एक नई प्रथा का जन्म हुआ है और वह प्रथा है शादी के पहले माँ बनने तक परस्पर यौन सम्बन्ध स्थापित करना।
चूकि इसाई मिशनरियों की मदद से ये बालाएं आत्मनिर्भर अपने परिवार से अलग-थलग रहने लगती है , इसलिए उसे सामाजिक तौर पर किसी भी युवक के साथ रहने में कोई परेशानी नही होती। अगर वह माँ बन जाती है तो बात शादी तक पहुँचती है अन्यथा चल चिरियां दूसरे घोंसले पर वाली कहावत चरितार्थ होने लगती है।
एक सर्वेक्षण के अनुसार मुख्यतः सरकारी गैर सरकारी अस्पतालों,स्कूलों ,दफ्तरों आदि में कार्य करने वाली ऎसी बालाओं की तादात करीव ९८ फीसदी है। जिनमे शादी पूर्व एक से अधिक के साथ खुले यौन- सम्बन्ध स्थापित करना आम बात हो गई ही है।

रविवार, 27 सितंबर 2009

"प्रभात ख़बर औए ३६५ दिन में सौतन-डाह"

-मुकेश कुमार-
इन दिनों झारखण्ड की एक इलेक्ट्रोनिक चैनल ३६५ दिन और प्रसिद्ध हिन्दी दैनिक प्रभात खबर के बीच चल रही तू तू -मै मै हाथापाई तक पहुंच गई है । चैनल की उम्र जहाँ ८ माह है , वहीँ अखबार की उम्र २५ साल से ऊपर है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार चैनल ने एक कथित वित माफिया 'नारनोलिया' के धोखाधारी के मामले को जबसे प्रमुखता से प्रसारित करना शुरू किया है तो पुलिश प्रशासन के साथ अखबार के प्रधान सम्पादक हरिवंश ने ब्याक्तिगत तौर पर अपने संपर्को और अखबार के मार्फ़त भारी दबाब डालने में लगे हैं। इसकी एक और बजह यह है की चैनल ने एक सार्वजनिक भूमि हथियाने का एक मामला प्रसारित किया है जिसमे हरिवंश की प्रमुख भागीदारी बताई गई है । श्री नारनोलिया के इस शिकायत पर राजधानी रांची के एस पी प्रवीण कुमार ने चैनल सम्पादक को गिरफ्तार करने का आदेश दिया है। ये अलग बात है की चैनल के इरादे भी कुछ नेक नजर नही आते ।सूचना जारी करने तक चैनल के प्रमुख सारे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग को लेकर होटवार जेल में बंद भूख हरताल में अपने जमानत का इन्तजार कर रहें हैं ।

"नीतीश की कूटनीति का एक हिस्सा है नई चुनावी हार"

-मुकेश कुमार-
बिहार में एन डी ए की चुनावी हार क्या है?वाकई नीतिश का कुनबा फेल हो रहा है या वे इस अप्रत्यासित हार में अपनी भावी जीत का जश्न मना रहा है? राष्टीय राजनीति विश्लेषक इन दिनों इस सबाल का जबाव पाने के लिए राजधानी पटना के गलियों को सूंघते फ़िर रहे है ।
आख़िर पिछले चुनाव में अपनी विकासपरक छवि के बल लालू - पासवान के साथ कांग्रेस की नकेल कसने वाले नीतिश दो तिहाई सीटो के अन्तर से कियों पीछे हो गए ।सुच पूछिये तो लोजपा के सुप्रीमो रामबिलास पासवान को उन्ही के मांद में शिकस्त देने और बीस साल तक छाती पर मुंग दल कर राज कराने का दंभ भरने वाले लालू प्रसाद को पाटलिपुत्र जैसे यादव बहुल सीट पर पटकनी देकर नीतिश ने यह संदेश दिया था कि जो बिहार को राष्ट्रीय मानचित्र पर अपनी प्रदूषित छवि में चमक भर सके।
गत १७ सितम्बर को १८ सीटो के आए चुनाव परिणाम में नीतिश की पार्टी ज द यू को मात्र ३ सीटो पर ही संतोष करना परा । उधर काग्रेस और नीतिश सरकार पर साझा आक्रामक तेवर अख्तियार करते हुए लालू-पासवान ने ९ सीटो पर पतह हासिल कर ली।
बेशक ये जीत लालू-रामविलास की जोरी को एक नई स्फूर्ति प्रदान करेगी।अब सबाल उठाता है कि क्या लालू का सितारा फ़िर बुलंद होगा? प्रदेश में फ़िर वही ---राज कायम होगा? यदि इस सबाल का जबाव गहनता से ढूढने पर जिस तरह के कूटनीति सामने आती है वे 'तीर' कांग्रेस को छेड़ती नजर आती है । नीतिश नही चाहते है कि काग्रेस बिहार में फ़िर से ८० के दशक जैसा जनाधार बना ले। इसी रणनीति के तहत नीतिश ने अपने 'बिग ब्रदर ' लालू दल को संजीवनी दिया है।
लालू भी यह मान लिया है कि वे नीतीश राज का बिरोध कर अब भले ही बिहार सुख न भोग सके , इतना तो अवश्य होगा की दमदार राजनीति बरकरार रहेगी। उधर नीतीश को अब लालू - पासवान से कोई ख़तरा नजर नही आती है
लगता है की उनकी सरकार को जब भी धक्का लगेगा तो कांग्रेस से। सोनिया की खुली और राहुल की राजनीति में दमदार उपस्थिति से कांग्रेसियों में इक नई ऊर्जा का संचार हुआ है। नीतिश के सहयोगी भाजपा भी लालू-पासवान से अधिक कांग्रेस पर नजर रखना चाहती है ।

"ये झारखंड प्रधान है. !!"

-मुकेश कुमार-
जी हाँ ये भारतीय क़ानून है। इसे किसने लिखा ? बाबा आंबेडकर साहेब ने / गांघी जी ने /नेहरू जी ने या फ़िर हमारे राजेन्द्र बाबू ने । जिसके तहत झारखण्ड में ये नजारा दिख रहा है।
केन्द्र सरकार ने ग्रामीण पंचायती राज्य व्यवस्था के तहत विकास कार्यों के मजबूती के लिए सारे अधिकार ग्राम प्रधानों को सौंप दी है । समूचे प्रांत में प्रधान के सारे पद अनुसूचित जाति जन जाति के लिए आरक्षित कर दी है।
एक सर्वेक्षण के अनुसार करीव 35% प्रधान असिक्षित है । ७८ % से अधिक ग्राम प्रधान हरिया-दारू-गांजा-भांग जैसे दिमागी संतुलन ख़राब करने वाली नशा करते है। करीव ९२% ग्राम प्रधानो को विकास योजनाओं की सही जानकारी नहीं है । वामुश्किल एक-दो % से इतर लूट-खसोंट में संलिप्त हैं। आधे से अधिक प्रधान ग्रामीणों की की बैठक सुचारू ढंग से नही करते और सरकारी अधिकारियों से कभी कभार ही बातचीत कर पाते हैं।
उक्त सर्वेक्षण में इस तरह के कई संवेदनशील तथ्य उभरकर सामने आई है।उल्लेखनीय तत्थ है कि झारखण्ड प्रांत में करीव ३७% आबादी अनुसूचित जाति जन जाति की है, वही ८३% आबादी उन लोगों की है जिसे शाशन प्रसाशन मूलवासी मानता है या बाहरी।

"झारखंड में दिखेगी विनाश की रेखा !!"

-मुकेश कुमार-
आजादी साठ साल बाद भी झारखंड की में विकास नसीब नहीं है । औधोगिक विकास के नाम पर यहाँ विनाश -लीला कहीं अधिक रची गई है। सुच पूछिये तो प्रचुर वन खनिज संपदा से सजी भगवान् बिरसा की इस पावन भूमि पर आज उग्रवाद,भ्रस्टाचार, भूखमरी,गरीवी, बेकारी आदि के जो कांटे बिखरे हैं ,वे दरअसल इन्ही विनाश लीला की देन है। इक तरह से केन्द्र व् राज्य की सरकारें यहाँ के लोगों को खानाबदोश समझ ली है।
इन दिनों भारत सरक मार्ग निर्माण प्राधिकरण ने रास्ट्रीय उच्च मार्ग -३३ के चौरीकरण का कार्य किया है । इसके लिए उसे निर्माण हेतू वर्तमान मार्ग से करीव दूगनी १०० फीट भूमि की आवश्यकता है। कहते हैं की लूट -खासोंत में आकंठ डूबे सम्बंधित विभागों ने १९३२ के सर्वे के आधार पर ही सीधी लाइन खींच उक्त रोड का नक्शा बना लिया है। यदि इस नक्शे के आधार पर रोड बनाई गई तो रांची (विकास) से प्रस्तावित बरही (हजारीबाग) तक का जन जीवन अस्त-व्यस्त हो जायेगी। लाखों लोग बेघर हो जायेंगे। लाखों की रोटी-रोजी छीन जायेगी। धनबाद झरिया कोयलांचल से लगे यह इलाका लगभग खंडहर नजर आयेगी. क्योंकि आज के ताजा स्थिति का अबलोकन किए बगैर बनाए गए इस 'टेबुल मैप' के अनुसार रोड के दोनों किनारे कही १०० फीट तो कही २००-३००-४०० फीट भूमि ऊल-जलूल तर्क देकर जबरन अधिग्रहण की जा रही है। इस तरह के मार्ग न तो कहीं बने हैं और न ही झारखण्ड जैसे जंगली-पठारी ईलाके में बनानी संभव है। जानकार बतातें हैं की इस नए सरकारी विनाश रेखा के बनने से जहाँ एक और प्राकृतिक सौन्दर्य ख़त्म हो जायेगी,लोग -बाग़ फ़िर से जंगली जीवन जीने को मजबूर हो जायेगें. इससे सबसे अधिक प्रभावित रांची जिले के इराबा,चकला,ओरमांझी चुत्तूपालू के लोग है. फिलहाल , करीव १४ साल पूर्व अलग हुए झारखण्ड प्रान्त के हालत अपने समकक्ष भाईयों (छतीसगढ़, उतराखंड) से काफ़ी भिन्न है। जहाँ वे राज्य दिन दुनी रात चौगनी तरक्की कर रही है वहीँ यह राज्य रसातल की ओर रही है।और इसके प्रति जबावदेह लोग सिर्फ़ समस्याओं की आग पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने में मशगुल है .

"ये झारखंड नगरिया तू लूट बबुआ"

-मुकेश कुमार-
"ये है झारखण्ड नगरिया तू लूट बबुआ। यहाँ सोने चांदी के अनेकों खजाना , जितना चाहे दोनों हाथ से तू लूट बबुआ। जी हाँ ,चौंकिए मत। ये झारखण्ड राज्य है । हर तरफ़ लूट ही लूट । कोई जंगल लूट रहा है। कोई जमीन लूट रहा है। कोई पठार-पर्वत लूट रहा है तो कोई नदी लूट रहा है "
सरकारी योजनाओं की लूट तो यहाँ के लूटेरों के लिए ऊंट के मुँह में जीरा के फोरन के समान है। इससे उसके होटल -सोटल का खर्चा-पानी भी नहीं निकलता है। कहने को ये जंगल-झार है लेकिन अंग्रेजो के जमाने से ही एक नामी लूट केन्द्र रहा है। आजादी के बाद से साहेब लोग एक जेब राजधानी दिल्ली में भरकर लूटते थे तो दूसरी जेब राजधानी पटना में भरकर।
इधर जब से बिहार से अलग होकर बेचारा निरीह झारखंड राज्य बना है तबसे लूटेरों ने इसे अपने बाप का राज समझ लिया है। यहाँ के लोग आज कायम लूट राज का ठीकरा भले बाहरी तत्बों के सर तोरते है लेकिन, आज की तारीख में सच्चाई यह है कि आदिबासियों के आधुनिक विकास के नाम पर पृथक इस झारखण्ड राज में आदिवासियों का सबसे बरा शोषक एक आदिवासी ही उभरकर सामने आया है। मरांडी,मुंडा ,सोरेन हो या मधु कोरा । हमाम में सब नगें हैं। इनके बंधू तिर्की ,एनोस एक्का ,हरिनारायण राय सरीखे चेले तो गुरू गुर तो चेला चीनी बन गए हैं। सुदेश,चंद्रप्रकाश,कमलेश,शाही,साहू आदि सब एक पर एक हैं।
भारत सरकार के कबीना मंत्री एवं राजधानी के सांसद सुबोध कान्त सहाय के एक लगाओ सौ पाओ की राजनीति से सब वाकिफ है। जोर-घटाव -गुना-भाग में ये बहुत माहिर हैं। हार में भी जीत निकाल लेतें है। सुरुआती दौर में प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में जारी लूट राज पर नकेल कसने की कोशिश की तो लूटेरो ने उनकी राजनीति की नरेटी दबा दी।आज लूट राज पर चीखें जा रहे हैं लेकिन उनकी आबाज किसी के कान में भी नहीं जा रही है। इसके बाद अर्जून मुंडा लूटो-लूत्वाओ और राज करो की नीति तो अपनाई तो जरूर ,हाथ-पैर सबसे लूटने वालों ने उन्हें। भी दरकिनार कर दिया और मधु कोरा को अपना मुखिया चुन लिया. भागी बीबी घर बापस आई सरीखे उपलब्धि पाने इस साहेब के राज में लूटेरों ने कुऊब छककर मधु पीया। वे अपना खुमार उतारने के लिए तैयार नहीं थे। दिशोम गुरू शिबू अपनी इच्छा के मुताबिक सता-सुख भोगा भी नही की लूटेरों की फौज दीवार बन गई। शायद उन लोगों को यह भय था की यदि गुरूजी की सेहत सुधरी तो उनकी सेहत ख़राब होने लगेगी। महामहिम राज्यपाल रजी का राज भी कम निराला नही था। इनके राज में लूटेरों को लूटो की प्रथा कायम हो गई। वर्तमान 'शंकर' नारायण की महिमा तो और निराली है।
इनकी मानसिक स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की इन्होने अपना पदभार संभालते ही सनसनीखेज बयान दिया । इनका नापा तूला बयान् है की झारखण्ड प्रान्त में जारी भीषण उग्रवाद सिर्फ़ बेईमान अफसरों व नेताओं को निशाना बनाते रही है भविष्य में भी वे ऐसे ही तत्वों का सफाया करेगी। मानो उग्रवादियों ने एकजूट बैठक कर अपना भूत और भविष्य उनके समक्ष इमानदारी से रख दिया हो ।
अब इस 'शंकर' नारायण को कौन बताये की प्रान्त में समानांतर सर्हार चला रहे कुख्यात उग्रवादियों के शिकार सैकरों नेताओं ,अधिकारियों के अलावे हजारों राज्य पुलिस-भारतीय सेना के जवान भी हुए है। क्या महामहिम सप्रमाण बता सकते हैं की क्या ये सारे शहीद वेईमान और भ्रष्ट थे।