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रविवार, 24 अप्रैल 2011

चर्चा रांची के दैनिक सन्मार्ग मानवता की

बड़ा हुआ तो क्या हुआ,जैसे पेड़ तार-खजूर.
  पथिक को छाया न दे,फल लगे अति दूर
रांची की बड़े मीडिया हाउसों के बड़े-बड़े दावे.....कोई कहता हम हैं देश के नं.1....तो कोई कहता हम हैं झारखंड के नं.1....कोई तो यहां तक कहता है कि मैं अखबार नहीं,आंदोलन हूं....कोई कहता है कि सच है तो दिखेगा..कोई कहता है खबर से समझौता नहीं...

ऐसे दावे-प्रतिदावों के बीच अपनी अलग पत्रकारिता के बल मानवीय संवेदनाओं को आज छू गया.......रांची से नये तेवर-अंदाज में प्रकाशित दैनिक सन्मार्ग और उसके संवाददाता.मुझे यह जान कर इस अखबार को लेकर बहुत आत्म संतोष हुआ कि इसके छायाकार/संवाददाता करीव 25 किलोमीटर दूर चल कर पीड़ित के घर पहुंचे और मामले को प्रकाशित ही न किए..अपितु,प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री हेमलाल मुर्मू स्तर तक बात उठाई. .......... ...... ......................................................................................................

शुक्रवार, 21 मई 2010

राष्ट्रपति शासन की और बढ़ रहा है झारखंड

राँची: वेशक शिबू सोरेन क्या बोलते-करते हैं इस पर विश्वास अब नहीं किया जा सकता लेकिन अपने बोकारो आवास पर उन्होंने पत्रकारों से जो कुछ कहा,वे स्पष्ट संकेत दे रहे है कि झारखंड जैसा बदहाल प्रांत एक बार फिर राष्टपति शासन की ओर बढ़ रहा है.
मुख्यमंत्री एंव झारखंड मुक्ति मोर्चा के सर्वोसर्वा नेता(?) शिबू सोरेन ने कहा कि प्रदेश में जब उनकी सरकार काम कर रही है तो कोई नई सरकार बनाने का सवाल ही कहाँ उठता है. उन्होंने कहा कि वे मुख्यमंत्री हैं और किसी सूरत में इस्तीफ़ा नहीं देंगे.
महज ४८ घंटे पहले दो बार मुख्यमंत्री रह चुके भाजपा सांसद अर्जुन मुंडा को सीधे आर्शीवाद देने वाले श्री सोरेन ने पलती मारते हुये कहा कि पहले भाजपा अपना नेता तय करे.इसके बाद उनकी पार्टी झमुमो कार्यसमिति की बैठक कर मुख्यमंत्री पड़ का फैसला करेगी. यदि भाजपा पहले के २८ महीना झामुमो को सौंपे तो बात बन सकती है.
उनके मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए छह महीने के भीतर चुनाव लड़ने की वाध्यता की बाबत उन्होंने कहा कि वे चुनाव लड़ेगें.
राजधानी राँची में कभी कुछ,राजधानी दिल्ली में कभी कुछ तो अपने बोकारो आवास में कभी कुछ बोलकर प्रदेश में राजनीतिक तापमान बढ़ाने-घटने में माहिर हो चुके श्री सोरेन के पिछले ७२ घंटे का आंकलन करने पर साफ स्पष्ट होता है कि वे किसी अन्य को मुख्यमंत्री बनाने देने के इरादे में नहीं हैं.यदि वे मुख्यमंत्री पद पर रहते हुये विधानसभा का चुनाव अब लड़ना भी चाहें तो ये संभव प्रतीत नहीं होता है क्योंकि वे करी चार महीने से वतौर सांसद मुख्यमंत्री के पड़ पर बने हैं और चुनाव आयोग को संबंधित सूचना भेजने की अंतिम तारीख १५ मई निकल चुकी है.
उधर भाजपा ने शिबू के इन सब बातों को अब काफी गंभीरता से लिया है और उसके शीर्ष नेतृत्व ने पूर्व के निर्णयों से एक कदम भी न हटने का इरादा बना चुकी है.उधर कांग्रेसनीत यूपीए गठबंधन शिबू सोरेन को सता का भावी सब्जबाग दिखाकर उनकी झामुमो को भाजपा से अलग करने हेतु सारे तिकडम भिड़ा रखे हैं.ताकि एक योजनागत तरीके से झारखंड प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करवाया जा सके. जाहिर है कि राष्ट्रपति शासन का अर्थ होता है-केंद्र का शासन और ऐसे में एक झटके में प्रदेश की पूरी सता स्वतः उसके हाथ में आ जायेगी.

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

अर्जुन मुंडा को ये बात भी समझनी होगी

कांग्रेस-भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों की जमीन पर लालू-शिबू जैसे स्वार्थी नेताओं द्वारा जबरिया बिहार के गर्भपात से जन्में झारखंड की स्थिति का अगर निष्पक्ष आंकलन किया जाये तो इस प्रांत की हालत काफी दयनीय है.पिछले पन्द्रह वर्षों की अल्पआयु में ही भगवान बिरसा की जन्म-कर्मभूमि नेताओं के निकम्मेपन से मृत्युशया पर कराह रहा है और इसकी सुध लेने वाला कही कोई दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा.
यह एक विडंबना ही है कि यहाँ की राजनीति जो विकास के हर क्षेत्र को नियंतित करने का मादा रखती है,उसपर नेताओं से अधिक पत्रकारिता कहीं अधिक हावी नज़र आती है.एक तरह से राजनीतिक जोड़-तोड़ के नए समीकरण कुछ इस तरह से गढे जाते हैं कि यहाँ के नेता उसी में उलझ कर रह जाते है. मै आज कल राजधानी रांची के जिस ओरमांझी क्षेत्र में स्थाई तौर पर रह रहा हूँ,यहाँ की राजनीतिक-पत्रकारीय घालमेल देखकर युहीं दंग रह जाता हूँ.मै भी कभी मुजफ्फरपुर,पटना,नालंदा,इंदौर,दिल्ली,जलंधर जैसे स्थानों पर सक्रीय पत्रकारिता की है लेकिन,इस तरह के हालात कभी महसूस तक नहीं किये.उदहारण के लिए यहाँ करीव एक दर्जन स्थानीय संवाददाता है लेकिन कोई सूचना-समाचार एक-दो लिखता है और एक ही लिखावट-तथ्य में संप्रेषित कर डालता है.समाचार पत्रों के संपादकगण भी सारे पत्रों में उसे सजाने में कोई गुरेज नहीं करते क्योंकि स्टार पर भी प्रायः यही तकनीक अपनाई जाती है.जाहिर है इस दव-पेंच में एकपक्षीय माहौल स्वाभाविक तौर पर उत्पन्न हो जाता है और राजनेताओं में इतनी मानसिक स्वछता नही होती कि वे इस खेला को समझ पाए.
सच पूछिए तो वतौर दिमागी पेंडुलम की तरह डोलते रहे झामुमो के शिबू सोरेन और उनके महत्वाकांक्षी पुत्र हेमंत सोरेन की आपसी टकराव के कारण वर्तमान में जो ताज़ा हालत झारखंड उत्मन्न हुये हैं,उसमें मीडिया के भी काफी दाँव-पेंच छुपे है.हेमंत ये मान चुके है कि उनके पिता शिबू की उतराधिकारी उन्हें बनाना बहुत जरूरी है.कहते हैं कि इसे लेकर श्री शिबू सोरेन को अपनी पत्नी रूपी सोरेन,बड़े पुत्र स्व.दुर्गा सोरेन की विधवा सीता सोरेन और उनकी झामुमो के विधायक दल के नेता पुत्र हेमंत सोरेन के भी भारी दबाब का सामना एक लंबे अरसे से करना पड़ रहा है.इस दबाब को आप पारिवारिक कलह की संज्ञा भी दे सकतें है.

आज-कल पारिवारिक कलह के भी शिकार हैं शिबू सोरेन

कांग्रेस-भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों की जमीन पर लालू-शिबू जैसे स्वार्थी नेताओं द्वारा जबरिया बिहार के गर्भपात से जन्में झारखंड की स्थिति का अगर निष्पक्ष आंकलन किया जाये तो इस प्रांत की हालत काफी दयनीय है.पिछले पन्द्रह वर्षों की अल्पआयु में ही भगवान बिरसा की जन्म-कर्मभूमि नेताओं के निकम्मेपन से मृत्युशया पर कराह रहा है और इसकी सुध लेने वाला कही कोई दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा.
यह एक विडंबना ही है कि यहाँ की राजनीति जो विकास के हर क्षेत्र को नियंतित करने का मादा रखती है,उसपर नेताओं से अधिक पत्रकारिता कहीं अधिक हावी नज़र आती है.एक तरह से राजनीतिक जोड़-तोड़ के नए समीकरण कुछ इस तरह से गढे जाते हैं कि यहाँ के नेता उसी में उलझ कर रह जाते है. मै आज कल राजधानी रांची के जिस ओरमांझी क्षेत्र में स्थाई तौर पर रह रहा हूँ,यहाँ की राजनीतिक-पत्रकारीय घालमेल देखकर युहीं दंग रह जाता हूँ.मै भी कभी मुजफ्फरपुर,पटना,नालंदा,इंदौर,दिल्ली,जलंधर जैसे स्थानों पर सक्रीय पत्रकारिता की है लेकिन,इस तरह के हालात कभी महसूस तक नहीं किये.उदहारण के लिए यहाँ करीव एक दर्जन स्थानीय संवाददाता है लेकिन कोई सूचना-समाचार एक-दो लिखता है और एक ही लिखावट-तथ्य में संप्रेषित कर डालता है.समाचार पत्रों के संपादकगण भी सारे पत्रों में उसे सजाने में कोई गुरेज नहीं करते क्योंकि स्टार पर भी प्रायः यही तकनीक अपनाई जाती है.जाहिर है इस दव-पेंच में एकपक्षीय माहौल स्वाभाविक तौर पर उत्पन्न हो जाता है और राजनेताओं में इतनी मानसिक स्वछता नही होती कि वे इस खेला को समझ पाए.
सच पूछिए तो वतौर दिमागी पेंडुलम की तरह डोलते रहे झामुमो के शिबू सोरेन और उनके महत्वाकांक्षी पुत्र हेमंत सोरेन की आपसी टकराव के कारण वर्तमान में जो ताज़ा हालत झारखंड उत्मन्न हुये हैं,उसमें मीडिया के भी काफी दाँव-पेंच छुपे है.हेमंत ये मान चुके है कि उनके पिता शिबू की उतराधिकारी उन्हें बनाना बहुत जरूरी है.कहते हैं कि इसे लेकर श्री शिबू सोरेन को अपनी पत्नी रूपी सोरेन,बड़े पुत्र स्व.दुर्गा सोरेन की विधवा सीता सोरेन और उनकी झामुमो के विधायक दल के नेता पुत्र हेमंत सोरेन के भी भारी दबाब का सामना एक लंबे अरसे से करना पड़ रहा है.इस दबाब को आप पारिवारिक कलह की संज्ञा भी दे सकतें है.

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

भाजपा-झामुमो के बीच जारी है अंतरंग याराना

भारतीय जनता पार्टी ने झारखण्ड में शिबू सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापसी का फैसला आज टाल दिया है.भाजपा नेताओं को निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक गुरुवार को सुबह 11 बजे तक राज्यपाल एम.ओ.एच. फारूख से मिलना था लेकिन वो नहीं पहुंचे। क्योंकि ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि जेएमएम को समर्थन देने के मामले पर फिर से विचार हो सकता है।
बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है कि जेएमएम को समर्थन पर फिर से विचार संभव है। उनका यह बयान गुरूजी के बेटे हेमंत सोरेन के लगातार उस गुहार के बाद आया है जिसमें हेमंत ने यह गुहार लगाई है कि बीजेपी उनका साथ ना छोड़े। हेमंत सोरेन ने नितिन गडकरी को इस मामले में चिट्ठी लिख कर गुहार लगा कर अपना फैसला बदलने को कहा है । हेमंत सोरेन ने तो बीजेपी को अपना मुख्यमंत्री लाने की पेशकश तक कर डाली है।
इधर बीजेपी भी जेएमएम की इस पेशकश पर यूटर्न के संकेत दे रही है । रांची में बीजेपी नेताओं ने राज्यपाल से मिलने का वक्त मांगा था, लेकिन अब बीजेपी ने फिलहाल ये मुलाकात टाल दी है ।दिल्ली में आडवाणी, सुषमा स्वराज समेत बीजेपी के आला नेता इसी मसले पर विचार कर रहे हैं। आपको बता दें कि बुधवार को विपक्ष द्वारा लाए गए कटौती प्रस्ताव पर हुए मतदान में सोरेन ने कांग्रेस की नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के समर्थन में मत डाला था। जिससे भाजपा नाराज हो गई थी ओर उसने सोरेन सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

नीतीश जी का ब्लॉग:गुणगान करने लायक अभी कुछ नहीं.

बिहार के लोकप्रिय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के द्वारा "nitish speaks"नामक ब्लॉग लिखने की खबर पाकर मैं काफी रोमांचित हो उठा. देश में इस तरह के दूरदर्शी जनप्रतिनिधियों के कदम का सर्वत्र सराहना होनी चाहिए. श्री कुमार के ब्लॉग में अभी कुछ खास नहीं है लेकिन, पूर्ण आशा-विश्वास है कि आगे वे एक बेहतर ब्लॉगर साबित होगें. इसके लिए उन्हें अपने लंबे राजनीतिक-सामाजिक-प्रशासनिक अनुभवों को प्राथमिकता देनी होगी कि सरकारी योजनाओं के प्रचारिक स्वरुप को. इसका भार आधिकारिक माध्यमों पर छोड़ देनी चाहिए. आज बिहार जैसे जटिल प्रदेश के शासन की बागडोर वे जिस साहस से सफलतापूर्वक संभाल रहे है,आज की अत्यंत प्रभावशाली ब्लॉगर-दुनिया उन्हें निश्चित तौर पर काफी मार्गदर्शन-सहयोग-प्रोत्साहन प्रदान करेगी.





श्री कुमार ने अपने ब्लॉग में अभी तक मात्र एक पोस्ट "mukhymantri balika cycle ojna" प्रकाशित की है. जिस पर अब तक करीव ५४३ कमेन्ट मिले है. ये सब उनकी लोकप्रियता बखान करती है उनका यह ब्लॉग यदि हिन्दी भाषा में होगी तो और भी काबिले तारीफ मानी जायेगी.उनके द्वारा अंग्रेजी भाषा में ब्लॉग लिखना हिन्दी के प्रति उदासीनता (?)प्रकट करती है.

शनिवार, 27 मार्च 2010

ई शिबू सोरेन से कुछ न होगा !

झारखंड विधान सभा के अंदर हो या बाहर. इतना कुशासन मैनें कभी न देखा ! बिहार के गर्भपात से जन्में इस प्रदेश के ताजा स्थिति बहुत ही भयावह है.शासन-प्रशासन कही भी दिखाई दे रहा.बिजली-पानी तक के लिये हाहाकार मचा है. कहीं कोई विकास नहीं हो रहा. हर तरफ मनमानी राज कायम है.
सच पूछिए तो जब भाजपा के रघुवर दस और आजसू के सुदेश महतो के सहयोग से झामुमो के सर्वोसर्वा शिबू सोरेन मुख्यमंत्री की हैसियत से बागडोर संभाली तो आम जनता को लगा कि हालात कुछ न कुछ जरूर सुधरेगा.लेकिन चेला तो चेला गुरू भी सुभान अल्लाह निकला.इतना निकम्मा मुख्यमंत्री और इतनी निकम्मी सरकार की कल्पना किसी ने भी न की होगी.
ताजा हालत देखिये.सर्वत्र उग्रवादियों का तांडव है.पुलिस मध्य बिहार ग्रामीण बैंक के एक निर्दोष वरिष्ठ अधिकारी व उसके मासूम बीबी-बच्चे को डेंगाने में ही अपनी मर्दानगी समझती है.अखबार,रेडियो,टीवी की सप्रमाण सुर्खियाँ के बाबजूद विधानसभा में राज्य सरकार और उसकी मुखिया कहता है कि जांच के बाद कारवाई होगी. कहते है. कि शुरू में जब मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को इस घटना की जानकारी मिली तो उनकी त्वरित प्रतिक्रिया थी.....”उ बिहारी है न.कोई बदमाशी किया होगा.तभी उसे डीएसपी ने कुछ किया होगा.छोडो यह सब चलता रहता है.”
इसके पूर्व जामताड़ा में एक सभा को संबोधित करते हुये मुख्यमंत्री ने कहा कि अनुदान के नाम पर जहां देखो ये गरीब लोग भीख लेने-खैरात माँगने के लिये खड़ा रहता है.सब अपने से कमाओ-खाओ.उनकी सरकार किसी को कुछ भी देने वाला नहीं है.

बुधवार, 10 मार्च 2010

आखिर खुद कायदा-क़ानून तोड़कर यह कैसा सन्देश देना चाहते हैं बिहार के " सुशासन बाबू" यानी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

बिहार के पिछड़े वर्ग के नेताओं का कोई सानी नहीं है.आजादी के करीव चार दशकों तक एकछत्र राज करने वाले राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद यादव हों या वर्तमान में जद(यू)के कद्दावर नेता राज्य के लोकप्रिय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार.लालू जी ने बिहार की सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए कुछ ऐसी गलतीयाँ की थी,जिसका परिणाम सामने है और वे सत्ता से काफी बाहर दिखाई दे रहें है.आज कल देश में सुशासन बाबू के नाम से चर्चित हो रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी सत्तामद या कहिये लोकप्रियातामद में चूर होकर कुछ ऐसा ही कदम उठा रहे हैं जो उनके राजनीतिक जीवन हेतु घातक कदम साबित हो सकता है.सच पूछिए तो बिहार की सामाजिक बनाबट के आलोक में निश्चित तौर पर उन्हें नुकसान होगा हीं.
भारतीय संसद के दोनों सदनों में बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण बिल के मुद्दे पर नीतीश कुमार ने जो रवैया अपनाया,वह उनकी पार्टी जद(यू)को लेकर कई सवाल खड़े करते हैं.पहला ये कि क्या किसी महत्वपूर्ण पद पर बैठा व्यक्ति अपने राजनीतिक दल की मर्यादाओं से ऊपर होता है? यदि होता है तो नियम सिर्फ दल के कद्दावर नेताओं पर ही क्यों लागू होता है.आम कार्यकर्ताओं/ नेताओं पर लागू क्यों नहीं होता? वेशक नीतीश जी के आँखों पर उन्हीं की वर्णवादी मीडीया छवि ने एक ऐसा पर्दा डाल दिया है,जिसके पार उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है.आखिर शरद यादव जैसे अनुभवी पार्टी अध्यक्ष समाजवादी नेता के महिला आरक्षण बिल में सुधार की बात को सीधे नकार देना उनकी "हिटलरशाही" को ही इंगित करती है.जिसका आरोप उनपर आये दिन चर्चित रहा है. लगता है कि विगत विधानसभा उपचुनाव से उन्होंने कोई सबक नहीं ली है. जिसमें वे बुरी तरह से मात खाये थे. सिर्फ "लालू के भूत" का भय दिखाकर बिहार जैसे संवेदनशील आवाम को जनमत में तब्दील नहीं किया जा सकता.लालू जी ने पूर्व में जो "कांग्रेस की कुत्सित मानसिकता "का भयावहः चेहरा दिखाकर अधिक दिनों तक राज करने का मूल कारण वैकल्पिक विपक्ष का होना था.लेकिन नीतीश जी के सामने वैसी स्थिति नहीं है.उनका विचारहीन रवैया उन्हें निश्चित तौर ले डूबेगा.