पहले बाल ठाकरे,फिर उसका भतीजा राज ठाकरे और अब कांग्रेस के मुखियाईन सोनिया मैडम की महाराष्ट्र सरकार.कभी क्षेत्रीय तो कभी भाषाई भावनाएँ भडका कर वोट की राजनीति करने मे माहिर कांग्रेस और उसकी ऐसी सरकारे अखिर देशवासियो के सामने भारत की कैसी तस्वीर प्रस्तुत करना चाहती है!एक तरफ कांगेस सोनिया पुत्र को पार्टी का युवराज घोषित कर राष्ट्रीय राजनीति करने तथा खोई पहचान वापस पाने की एडी-चोटी एक कर रही है वही दुसरी तरफ अपनी ही नेत्रीत्व वाली राज्य सरकर को इस तरह की घिनौनी राजनीति कर रही है कि उसके पूर्वज भी शर्मा जाये.जबकि सच्चाई तो यह है मुंबई न तो बाल-राज ठाकरे की बाप की जागीर है और न ही कांग्रेस या अन्य किसी भी राजनीतिक दल की एकमात्र सूबा.इस तरह के लोग,दल या सरकार कल ये न कहना शुरू कर दे कि मुंबई मे वही लोग रह सकते है जिन्हे मराठी भाषा लिखने-पढने-बोलने आता हो.अब समय आ गया है सोनिया की कांग्रेस देश के सामने यह स्पष्ट करे कि वे स्व.नेहरू के फूट डालो राज करो की राजनीति करते रहेगी कि कभी सरदार बल्लभभाई पटेल की अखंड राष्ट्र के मूल्यो को बनाये रखेगीगुरुवार, 21 जनवरी 2010
सोनिया जी ये इटली नही,विश्व का सबसे बडा लोकतांत्रिक देश भारत है: अपनी महाराष्ट्र सरकार पर लगाम लगाईये.
पहले बाल ठाकरे,फिर उसका भतीजा राज ठाकरे और अब कांग्रेस के मुखियाईन सोनिया मैडम की महाराष्ट्र सरकार.कभी क्षेत्रीय तो कभी भाषाई भावनाएँ भडका कर वोट की राजनीति करने मे माहिर कांग्रेस और उसकी ऐसी सरकारे अखिर देशवासियो के सामने भारत की कैसी तस्वीर प्रस्तुत करना चाहती है!एक तरफ कांगेस सोनिया पुत्र को पार्टी का युवराज घोषित कर राष्ट्रीय राजनीति करने तथा खोई पहचान वापस पाने की एडी-चोटी एक कर रही है वही दुसरी तरफ अपनी ही नेत्रीत्व वाली राज्य सरकर को इस तरह की घिनौनी राजनीति कर रही है कि उसके पूर्वज भी शर्मा जाये.जबकि सच्चाई तो यह है मुंबई न तो बाल-राज ठाकरे की बाप की जागीर है और न ही कांग्रेस या अन्य किसी भी राजनीतिक दल की एकमात्र सूबा.इस तरह के लोग,दल या सरकार कल ये न कहना शुरू कर दे कि मुंबई मे वही लोग रह सकते है जिन्हे मराठी भाषा लिखने-पढने-बोलने आता हो.अब समय आ गया है सोनिया की कांग्रेस देश के सामने यह स्पष्ट करे कि वे स्व.नेहरू के फूट डालो राज करो की राजनीति करते रहेगी कि कभी सरदार बल्लभभाई पटेल की अखंड राष्ट्र के मूल्यो को बनाये रखेगीसोमवार, 11 जनवरी 2010
नागफनी के कांटो से घिरे झारखंड के "गुरूजी"
सोमवार, 4 जनवरी 2010
उग्रवाद:झारखंड के मुखिया शिबू सोरेन की गलतफहमी न.2
झारखंड मे नक्सलवाद कोई समस्या नही है.इसमे शामिल सब गांव का छोकडा लोग है.मीडिया मे बात का बतंगड बनाया जा रहा है. वेशक झारखंड के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने शिबू सोरेन का इरादा झारखंड को अपने सपनो के अनुरूप ढालना है.वे चाहते है कि उनकी सरकार उन वेवश लाचार लोगों तक ईमानदारी से पहुंचे,जिनकी गोद मे वे पले--बढे है. और एक अच्छा नेता भी वही होता है,जो अपने जमीन के दुःख दर्द को समझे तथा उस दिशा मे सार्थक पहल ही न करे अपितु ठोस कारगर कदम उठाये.लेकिन आदिवासियो के एक बडे तबके मे "दिशोम गुरू", मीडिया की नज़र मे "गुरूजी" तथा विरोधियो की जुबान पर "गुरूघंटाल" के नाम से चर्चित झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया,जो अब भाजपा और आजसू के सहयोग से प्रांत का मुखिया बन गये है,उन्होने पदभार संभालते ही जिस तरह के सोच प्रकट की है,उसका अवलोकन करने से मात्र यही स्पष्ट होता है कि विशुद्ध ग्रामीण परिवेश की राजनीति करने वाला यह नेता अनेक गलतफहमियो का शिकार है.जिसे दूर किये वगैर झारखंड जैसे बदहाल प्रांत का विकास संभव ही नही है.आईये हम बात करते है मुख्यमंत्री शिबू सोरेन उर्फ गुरूजी की गलतफहमी न.2 की. गुरूजी का साफ कहना है कि झारखंड मे नक्सलवाद कोई समस्या नही है. इसे बडी समस्या बनाया गया है. इसमे शामिल सब गांव का छोकडा लोग है.मीडिया मे बात का बतंगड बनाया जा रहा है.बकौल मुख्यमंत्री शिबू सोरेन किसी के घर मे किसी ने जान मार दी,उसके बदले की कार्रवाई मे हिंसा कर बैठता है. इसी का नाम उग्रवाद दे दिया गया है.वेशक इस तरह की स्पष्ट सोच के पीछे गुरूजी के ईरादे कुछ भी रहे हो.लेकिन जिस तरह की उग्रवाद की बात कर रहे है,झारखंड जैसे राज्य मे उस्की ताजा स्थिति कुछ अलग ही तस्वीर लिये हुये है.यदि वे आज भी अपने जवानी काल के उग्रवादी अनुभव का आंकलन समेटे समाधान ढूंढ रहे है तो उनकी यह बहुत बड़ी गलतफहमी है.पुलिस--प्रशासन का मनोबल तोडने वाला है.क्योंकि आज का उग्रवादी उनके जैसा तीर--धनुष लिये हुये लुक्का--छिपी का खेल नही खेल रहा है अपितु ए.के.47,आरडीएक्स,डाईनामाईट सहित अत्याधुनिक सेटेलाईट उपकरणो से लैस है और समुचे शासन--तंत्र पर भारी पड रहा है. गुरूजी को यह भी नही भूलना चाहिये कि स्कूलो,सामुदायिक भवनो,रेल स्टेशनो--पटरियो को उडाना और राज्य के विकास कार्यो से जुडे सरकारी गैर सरकारी कर्मियो तो दूर राजनीतिक दलो से भारी भरकम "लेवी" वसूलना आखिर क्या है? ऐसे मे गुरूजी सरीखे प्रांत के मुखिया की इस तरह मानसिकता फिलहाल एक तरह से उग्रवादियो के सामने संवैधानिक संस्थाओ द्वारा घुटने टिकवाने की मानी जा रही है और खुद के उग्रवादी अनुभवो के सहारे उग्रवाद की ताजा स्थिति का आंकलन और उसका समाधान ढूंढना एक गलतफहमी है भी
झारखण्ड की बदहाली के लिये बिहारियो को दोषी मानते है शिबू सोरेन
शिबू सोरेन की गलतफहमी न.1वेशक झारखंड के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने शिबू सोरेन का इरादा झारखंड को अपने सपनो के अनुरूप ढालना है.वे चाहते है कि उनकी सरकार उन वेवश लाचार लोगों तक ईमानदारी से पहुंचे,जिनकी गोद मे वे पले-बढे है. और एक अच्छा नेता भी वही होता है,जो अपने जमीन के दुःख दर्द को समझे तथा उस दिशा मे सार्थक पहल ही न करे अपितु ठोस कारगर कदम उठाये.लेकिन आदिवासियो के एक बडे तबके मे “दिशोम गुरू”, मीडिया की नज़र मे “गुरूजी” तथा विरोधियो की जुबान पर “गुरूघंटाल” के नाम से चर्चित झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया,जो अब भारतीय जनता पार्टी और आजसू के सहयोग से प्रांत का मुखिया बन गये है,उन्होने पदभार संभालते ही जिस तरह के सोच प्रकट की है,उसका अवलोकन करने से मात्र यही स्पष्ट होता है कि विशुद्ध ग्रामीण परिवेश की राजनीति करने वाला यह नेता अनेक गलतफहमियो का शिकार है.जिसे दूर किये वगैर झारखंड जैसे बदहाल प्रांत का विकास संभव ही नही है.आईये हम बात करते है मुख्यमंत्री शिबू सोरेन उर्फ गुरूजी की गलतफहमी न.1की.गुरूजी का कहना है कि झारखंड की ताजा बदहाली के लिये बरकरार बिहारी शासन व्यवस्था है,बिहारी कल्चर है.जब तक समुचा शासन-तंत्र “उनके लोगों” का नही होगा,तब तक झारखंड मे कोए कार्य नही दिखेगा. गुरूजी ने प्रायः सभी समाचार पत्रो को कल दिये अपने ताजा साक्षात्कार मे कही है. हम नही समझते कि गुरूजी के दिलोदिमाग मे कायम इस तरह की मनसिकता से झारखंड का कुछ भी भला हो सकता है.एक सर्वेक्षण रिपोर्ट बताता है कि बिहार से अलग झारखण्ड राज्य गठन के बाद से लेकर इन नौ वर्षो मे शासन-तंत्र के भीतर यहाँ सब कुछ बदल गया है.ग्रामीण शासन व्यव्स्था के तहत सारे ग्राम प्रधान अदिवासियो के लिये आरक्षित है और सारा संचालन उन्ही के हाथो मे है. अभी तक राज्य के जितने भी “मुखिया” हुये है,सब आदिवासी समुदाय के लोग ही हुये है. राज्य के आला अधिकारी या कर्मचारी भी करीव 66% की तादात मे झारखंडी लोग ही काबिज है.ऐसे मे बिहारी मानसिकता का कयम सवाल उठाना गुरूजी के लिये कितना उचित है, यहाँ एक बहस का मुद्दा हो सकता है.क्योंकि गुरूजी अब आम नेता नही बल्कि,राज्य के मुखिया है.जहाँ तक बिहारी मानसिकता का सवाल है तो शायद गुरूजी यह भूल रहे है कि अब बिहार और बिहारी मानसिकता तेजी से बदल गई है.अब न तो पहले जैसा बिहार है और न ही पहले जैसी बिहारी मानसिकता. कभी भय,भुख व भ्रष्टाचार का पर्याय रहा बिहार अब सुख-चैन की बंशी बजाने लगा है. जहाँ राष्ट्रीय विकास दर 8.02% है,वही बिहार का विकास दर 10.30% है. कही सुखाड तो कही बाढ का दंश झेलने के बाबजूद आज देश का दूसरा विकसित राज्य बन गया है.यहाँ परिवर्तन पिछले चार सालो के भीतर आया है,जिस अंतराल मे झारखंड की दुर्गति हुई है.
रविवार, 3 जनवरी 2010
झारखंड के राज्यपाल ने लोकतंत्र का गला घोंटा
लगता है कि नये साल 2010की शुरूआत जिस तरह से चन्द्रग्रहण से हुई है और इसके नक्षत्र प्रभाव आगे के लिये नकारात्मक माने जा रहे है.ठीक उसी तरह झारखंड के महामहिम राज्यपाल के. शंकरनारायणन ने विधानसभा सत्र आहूत करने तथा सत्रावसान की तिथि को लेकर अब तक तक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओ पर ग्रहण लगाया है,वह प्रमाणित करता है कि उनके इरादे आगामी 7 जनवरी को बहुमत साबित करने जा रहे सत्तासीन शिबू सरकार के प्रति कुछ नेक नही है.उल्लेखणीय है कि विधानसभा का सत्र कल 4 जनवरी से शुरू हो रहा है.,जो शिबू सोरेन सरकार के बहुमत हासिल करते ही समाप्त हो जाने की घोषणा की गई है.यदि हम लोकतांत्रिक नियम व परंपरा की बात करें तो लोकसभा और विधानसभा आहूत करने का अधिकार क्रमशः राष्ट्रपति और राज्यपाल को प्राप्त है. यदि इस आलोक मे राज्यपाल सत्र आहूत करते है तो आगे जरूरत के अनुसार विधानसभा के अध्यक्ष सत्र का संचालन करते है.हालांकि विशेषग्य कहते है कि राज्यपाल सत्र की अंतिम तिथि की घोषणा कर सकते है लेकिन ऐसी सूरत मे सत्र संचालन के क्रम मे निर्धारित तिथि को बढाने की जरूरत यदि विधनसभाध्यक्ष को आई या नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधियो को दवाब बना तब क्या होगा? विधानसभाध्यक्ष चाहकर भी कुछ नही कर सकते.यही वजह है कि राज्यपाल द्वारा सत्र आहूत और सत्र समाप्त करने की घोषणा करने का न तो प्रावधान और न ही परंपरा. कांग्रेसियो ने हार का ठीकरा केन्द्रीयमंत्री सुबोधकांत के सिर फोडा
झारखंड प्रदेश कांग्रेस के एक बडा धडा ने केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय के विरूद्ध खुला बगावत करते हुये हालिया सम्पन्न विधान सभा चुनाव मे पार्टी की करारी हार के लिये प्रमुख दोषी करार दिया है.शनिवार, 2 जनवरी 2010
उग्रवादियो के खिलाफ गांव के स्कूली बच्चो ने उठाई आवाज़: कहा कि “अंकल माओवादी हमारे स्कूल क्यो उडाते है?”
पिछले एक वर्ष के भीतर नक्सलियो ने अपने झारखंड--बिहार जोन मे अधिकारिक तौर पर 58 स्कूल भवनो को उडा दिये तथा 100 से उपर स्कूल भवनो को क्षतिग्रस्त कर दिये. मुख्यतः गांवो के इन स्कूल भवनो के न होने से एक बडे हिस्से मे शिक्षण कार्य ठप्प है.उग्रवादियो के
कारण सरकार भी अन्य स्कूल भवन बनाने या क्षतिग्रस्त स्कूल भवनो की मरम्मत कार्य नही करवा रही है. स्कूली बच्चे हर किसी से सवाल कर रहे है कि "अंकल माओवादी हमारे स्कूल क्यो उडाते है?"शनिवार, 26 दिसंबर 2009
झारखंड: गुरूजी ने राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा ठोंका
जैसा कि चुनाव परिणाम आने के बाद ही यहाँ तय लग रहा था कि झामुमो सुप्रीमो शीबू सोरेन सोरेन के नेत्रित्व मे मुख्यतः झामुमो,भाजपा,आजसू की सरकार बनेगी.हुआ भी ठीक वैसा ही.आज निर्धारित समय ठीक 3बजे श्री सोरेन पूर्ण बहुमत के साथ राज्यपाल भवन पहुँचे और सरकार बनाने का दावा पेश किया. झामुमो की ओर से गुरूजी के पुत्र विधायक हेमंत सोरेन ने 18 झामुमो विधायको,भाजपा की ओर से विधायक रघुवर दास ने 18भाजपा विधायको तथा आजसू की ओर से खुद पार्टी सुप्रीमो विधायक सुदेश कुमार महतो ने 5विधायको की सूची महामहिम राज्यपाल श्री शंकरनारायणन को सौंपी.इसके आलावे निर्दलीय विधायक व मधु कोडा सरकार मे शिक्षामंत्री रहे श्री बन्धु तिर्की ने भी अपना लिखित समर्थन पत्र सौंपा.तकनीकी कारणो से भाजपा के चुनाव सहयोगी जदयू के दोनो विधायक सशरीर समर्थन पत्र नही सौंप पाये.बाद मे फैक्स द्वारा जदयू के ओर से समर्थन पत्र सौंपी गई है. उल्लेखणीय है कि 81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा मे बहुमत हेतु 41 विधायको की समर्थन की जरूरत है.और श्री सोरेन के समर्थन मे कुल 44 विधायको का समर्थन प्राप्त है.