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शुक्रवार, 21 मई 2010

राष्ट्रपति शासन की और बढ़ रहा है झारखंड

राँची: वेशक शिबू सोरेन क्या बोलते-करते हैं इस पर विश्वास अब नहीं किया जा सकता लेकिन अपने बोकारो आवास पर उन्होंने पत्रकारों से जो कुछ कहा,वे स्पष्ट संकेत दे रहे है कि झारखंड जैसा बदहाल प्रांत एक बार फिर राष्टपति शासन की ओर बढ़ रहा है.
मुख्यमंत्री एंव झारखंड मुक्ति मोर्चा के सर्वोसर्वा नेता(?) शिबू सोरेन ने कहा कि प्रदेश में जब उनकी सरकार काम कर रही है तो कोई नई सरकार बनाने का सवाल ही कहाँ उठता है. उन्होंने कहा कि वे मुख्यमंत्री हैं और किसी सूरत में इस्तीफ़ा नहीं देंगे.
महज ४८ घंटे पहले दो बार मुख्यमंत्री रह चुके भाजपा सांसद अर्जुन मुंडा को सीधे आर्शीवाद देने वाले श्री सोरेन ने पलती मारते हुये कहा कि पहले भाजपा अपना नेता तय करे.इसके बाद उनकी पार्टी झमुमो कार्यसमिति की बैठक कर मुख्यमंत्री पड़ का फैसला करेगी. यदि भाजपा पहले के २८ महीना झामुमो को सौंपे तो बात बन सकती है.
उनके मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए छह महीने के भीतर चुनाव लड़ने की वाध्यता की बाबत उन्होंने कहा कि वे चुनाव लड़ेगें.
राजधानी राँची में कभी कुछ,राजधानी दिल्ली में कभी कुछ तो अपने बोकारो आवास में कभी कुछ बोलकर प्रदेश में राजनीतिक तापमान बढ़ाने-घटने में माहिर हो चुके श्री सोरेन के पिछले ७२ घंटे का आंकलन करने पर साफ स्पष्ट होता है कि वे किसी अन्य को मुख्यमंत्री बनाने देने के इरादे में नहीं हैं.यदि वे मुख्यमंत्री पद पर रहते हुये विधानसभा का चुनाव अब लड़ना भी चाहें तो ये संभव प्रतीत नहीं होता है क्योंकि वे करी चार महीने से वतौर सांसद मुख्यमंत्री के पड़ पर बने हैं और चुनाव आयोग को संबंधित सूचना भेजने की अंतिम तारीख १५ मई निकल चुकी है.
उधर भाजपा ने शिबू के इन सब बातों को अब काफी गंभीरता से लिया है और उसके शीर्ष नेतृत्व ने पूर्व के निर्णयों से एक कदम भी न हटने का इरादा बना चुकी है.उधर कांग्रेसनीत यूपीए गठबंधन शिबू सोरेन को सता का भावी सब्जबाग दिखाकर उनकी झामुमो को भाजपा से अलग करने हेतु सारे तिकडम भिड़ा रखे हैं.ताकि एक योजनागत तरीके से झारखंड प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करवाया जा सके. जाहिर है कि राष्ट्रपति शासन का अर्थ होता है-केंद्र का शासन और ऐसे में एक झटके में प्रदेश की पूरी सता स्वतः उसके हाथ में आ जायेगी.

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

आज-कल पारिवारिक कलह के भी शिकार हैं शिबू सोरेन

कांग्रेस-भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों की जमीन पर लालू-शिबू जैसे स्वार्थी नेताओं द्वारा जबरिया बिहार के गर्भपात से जन्में झारखंड की स्थिति का अगर निष्पक्ष आंकलन किया जाये तो इस प्रांत की हालत काफी दयनीय है.पिछले पन्द्रह वर्षों की अल्पआयु में ही भगवान बिरसा की जन्म-कर्मभूमि नेताओं के निकम्मेपन से मृत्युशया पर कराह रहा है और इसकी सुध लेने वाला कही कोई दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा.
यह एक विडंबना ही है कि यहाँ की राजनीति जो विकास के हर क्षेत्र को नियंतित करने का मादा रखती है,उसपर नेताओं से अधिक पत्रकारिता कहीं अधिक हावी नज़र आती है.एक तरह से राजनीतिक जोड़-तोड़ के नए समीकरण कुछ इस तरह से गढे जाते हैं कि यहाँ के नेता उसी में उलझ कर रह जाते है. मै आज कल राजधानी रांची के जिस ओरमांझी क्षेत्र में स्थाई तौर पर रह रहा हूँ,यहाँ की राजनीतिक-पत्रकारीय घालमेल देखकर युहीं दंग रह जाता हूँ.मै भी कभी मुजफ्फरपुर,पटना,नालंदा,इंदौर,दिल्ली,जलंधर जैसे स्थानों पर सक्रीय पत्रकारिता की है लेकिन,इस तरह के हालात कभी महसूस तक नहीं किये.उदहारण के लिए यहाँ करीव एक दर्जन स्थानीय संवाददाता है लेकिन कोई सूचना-समाचार एक-दो लिखता है और एक ही लिखावट-तथ्य में संप्रेषित कर डालता है.समाचार पत्रों के संपादकगण भी सारे पत्रों में उसे सजाने में कोई गुरेज नहीं करते क्योंकि स्टार पर भी प्रायः यही तकनीक अपनाई जाती है.जाहिर है इस दव-पेंच में एकपक्षीय माहौल स्वाभाविक तौर पर उत्पन्न हो जाता है और राजनेताओं में इतनी मानसिक स्वछता नही होती कि वे इस खेला को समझ पाए.
सच पूछिए तो वतौर दिमागी पेंडुलम की तरह डोलते रहे झामुमो के शिबू सोरेन और उनके महत्वाकांक्षी पुत्र हेमंत सोरेन की आपसी टकराव के कारण वर्तमान में जो ताज़ा हालत झारखंड उत्मन्न हुये हैं,उसमें मीडिया के भी काफी दाँव-पेंच छुपे है.हेमंत ये मान चुके है कि उनके पिता शिबू की उतराधिकारी उन्हें बनाना बहुत जरूरी है.कहते हैं कि इसे लेकर श्री शिबू सोरेन को अपनी पत्नी रूपी सोरेन,बड़े पुत्र स्व.दुर्गा सोरेन की विधवा सीता सोरेन और उनकी झामुमो के विधायक दल के नेता पुत्र हेमंत सोरेन के भी भारी दबाब का सामना एक लंबे अरसे से करना पड़ रहा है.इस दबाब को आप पारिवारिक कलह की संज्ञा भी दे सकतें है.

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

झारखंड का कोई भी नेता नीतीश कुमार क्यो नही बनना चाहता?

अलग झारखंड प्रांत गठन के बाद से यदि यहाँ की राजनीति की गहन अध्ययन की जाये तो एक बात साफ जाहिर होता है कि बिहार मे लालूजी के लूट आतंक राज्य के विरूद्ध जहाँ नीतीश कुमार ने नया संगठन खडा कर विकास और भाईचारे का नारा देकर आज की तारीख मे सब कुछ बदल दिया,वही झारखंड मे पुराने नेता अपने पुराने तेवरमे ही रहे और नये नेताओ का हुजुम मधु कोडा सरीखे निकले.कांग्रेस,भाजपा,झामुमो,राजद के नेताओ को पुराना मान छोड दे तो बन्धु तिर्की,एनोस एक्का,हरिनारयण राय,कमलेश सिन्ह,भानु प्रताप शाही सरीखे नेता राज्य की जनता के पिछे कम और काला धन इकठ्ठा करने के पिछे कही अधिक भागे.शयद इन्हे विश्वास है कि वह नेता उतना ही बडा होता है,जितना अधिक उसके पास धन होता है,चहे वह काला धन ही क्यो हो! यहाँ यह उल्लेख करना जरूरी हो जाता है कि जिस तरह से झारखंड के छोटे-छोटे संगठनो के नेताओ (निरदलीय विधायको) को सत्ता मे अहम भागीदारी मिली.यदि ये चाहते तो नई मिशाल कायम कर जनप्रिय बन सकते थे.लेकिन इनलोगो ने मिशाले तो कायम की है मगर यहाँ की 3 करोड दीन-हीन जनता को शर्मसार करने वाली.अब हम बात करते है आजसू के मुखिया सुदेश महतो की. मेरी समझ मे ये युवातुर्क पिछले एक दशक से सता की प्रमुख धुरी बन बैठा है.अर्जून मुंडा,मधु कोडा की सरकार तो इनके गुलाम बन गये थे. इस बार की शिबू सरकार की लट्टू भी इन्ही की कील पर है.इन्हे इनके सहयोगी विधायको को कई महत्वपूर्ण विभाग मिलते रहे है और इस बार भी मिले है.श्री मह्तो खुद कई महत्वपूर्ण विभाग के साथ होम मिनिस्टर तक बने है.लेकिन प्रांत मे उनका एक ऐसी भी उपलब्धि नही रही है,जिसपर आम जनता का विश्वास बढ सके.पहले एक,फिर दो और अब दो से पाँच सीट लाना.यह उनकी राज्यस्तरीय लोकप्रियता नही बल्कि सीमित लक्षित क्षेत्रो पर विशेष ध्यान देना है.इनकी मांसिकता से लगता है कि आगे भी वे इसी प्रयास मे जुटे रहेगे.सुदेश महतो को भ्रम है कि नेता का कद उसके उल्लेखणीय कार्यो से नही अपितु मंत्रिमंडल के बडे पद से बढता है.इन्हे कम से कम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से यह सीख लेनी चाहिये कि पद कोई भी हो,जनपरक कार्यो से लोकप्रियता हासिल की जा सकता है. बहरहाल,झारखंड मे जरूरत है एक ऐसी सरकार की जो अपना कार्यकाल पूरा करे और आमजन की कसौटी पर खरा उतर उतरे.यदि झामुमो के शिबू सोरेन को भाजपा और आजसू ने प्रदेश का मुखिया चुना है तो उन्हें राज्य हित मे कार्य करने की पूरी छूट मिलनी चाहिये. उन्हें ब्लैकमेल करने की कोशिश का अर्थ हैसमुचे झारखंड को ब्लैकमेल करना.जो किसी के भी हित मे नही है.

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

अब बाल ठाकरे जैसे लोगों को क्या कहेगे?

मैं जब भी शिवसेना नेता बाल ठाकरे या उसके भतीजा राज ठाकरे को किसी भी समाचार पत्र-पत्रिका या चैनल आदि पर देखता हूँ, मेरा मन-मस्तिष्क को घिन आने लगती है. चुहे जैसे बिल मे रहकर शेर की बोली कोई दोगली मानसिकता वाला आदमी ही बोल सकता है.मैं नही जानता कि ठाकरे ग्रुपका सामना अखबार कितना बडा अखबार है.अभी तक देखने को नही मिली है.देखने को मिली है तो सिर्फ इतना कि हिन्दी भाषी क्षेत्रो के लोगों से नफरत करने वाले इस बुढ्ढे के बातो को हिन्दी भाषी क्षेत्रो मे इतनी प्रमुखता से प्रसारित क्यो की जाती है?.हर दैनिक अखबार उसके बातो को इतनी आकर्षक ढंग से परोसने वाले संपादको को भी शर्म क्यो नही आती?ये लोग आखिर उसके इतने मुरीद क्यो है?बाल ठाकरे के सामना अखबार की सम्पादकीय पढ़कर आखिर ये खबर क्यो बनाते है? आस्ट्रेलिया मे जो कुछ हो रहा है वह एक विश्वस्तरीय शर्म मानी जानी चाहिये.लेकिन बाल ठाकरे जैसे लोगों के मुँह के बल नही,अपितु भारत जैसे विश्व के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश भारत के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के ठोस कारगर कदम के प्रयास से.प्रतिभा का सम्मान और संरक्षण होनी चाहिये.चाहे बिहार,उत्तर प्रदेश की मेहनतकश प्रतिभाएँ महाराष्ट्र जैसे प्रांत मे हो या समुचे देश के किसी भी हल्के की प्रतीभा आस्ट्रेलिया जैसे विदेश मे.

बुधवार, 13 जनवरी 2010

कब तक चलेगी झारखंड मे गुरूजी की सरकार? मंत्रिमंडल गठन के बाद पार्टी मे भूचाल तो आवंटित विभाग के बाद मंत्री भी नाखुश!


आखिर झरखंड के मुख्यमंत्री यानि गुरूजी करें भी तो क्या?

मंत्रिमंडल गठन के बाद उनके सहयोगी दलो मे भारी असंतोष है. उनकी पार्टी झामुमो मे तो स्थिति इतनी विस्फोटक नज़र आ रही है कि दो वरिष्ठ नेता के ताजा वागी तेवर से पार्टी ही टूट के कगार पर दिख रही है। इधर विभाग बंटबारे के बाद कोई मंत्री भी खुश नजर नही आ रहा है. सबको चाहिये मलाईदार विभाग. लगता है कि सिर्फ भाजपा के उपमुख्यमंत्री रघुवर दास ही मनमाफिक विभाग मिलने से खुश नजर आ रहे हैं। कहते हैं कि मंत्री लोग खरमास बाद यानि मकर संक्राति 14 जनवरी की चूडा-दही खाकर ही अपना कार्यभार संभालेगे

सोमवार, 11 जनवरी 2010

नागफनी के कांटो से घिरे झारखंड के "गुरूजी"


मुख्यमंत्री शिबू सोरेन और उनके बहुचर्चित मंत्रिमंडल सहयोगी सदस्य: हर किसी की अपनी एक कहानी तथा अन्दाज काफी निराली है.

सुबोधकांत की पिकनिक पार्टी: समर्थक ने लगाई आग : मंत्रीजी भी बाल-बाल बचे

लगता है कि धन--बल की राजनीति माहिर कांग्रेस के केन्द्रीय मंत्री व झारखंड प्रदेश से ईकलौते रांची सांसद सुबोधकांत सहाय के लिये नव वर्ष कुछ अच्छा संकेत समेटे नही दिख रहा है.लाख एडी--चोटी एक करने क बाबजूद जहाँ उनका मुख्यमंत्री बनने का सपना चखनाचूर हो गया,प्रदेश कांग्रेस के एक बडे तबके मे मुखर विरोध शुरू हो गया.वही कहते है कि मंत्री जी ने नव वर्ष मे अपने करीवी लोगों की भोजपार्टी रखी थी.उस पार्टी मे दिवाकर सिन्ह नामक उनका एक कट्टर समर्थक भी था.जिसे चुनावपूर्व मंत्री जी ने चुनाव वाद एक पियगो वाहन खरीद कर देने का वादा किया था.और चुनाव वाद भी अपने वादे पर कायम थे और नव वर्ष की भोजपार्टी मे उक्त वाहन देने का वादा किया था.लेकिन भोजपार्टी के दिन वे अपने वायदे से साफ मुकर गये.इससे उनका समर्थक इतना दुखी हुआ कि अपने शरेर पर सरेआम किरासन तेल छिडक कर आग लगा ली और मंत्री जी से लिपटने की कोशिश करने लगा. शुक्र था कि महज एक गज की दूरी पर उसे मंत्री जी के अंगरक्षको ने उसे रोक लिया.वेशक यह घटना नेताओ के लालच मे आने वाले अन्धसमर्थको के लिये एक बडा सबक है.

भावनाओ को भडकाती दैनिक हिन्दुस्तान

कभी बिहार मे जातिवाद और वर्गवाद की राजनीति चरम पर था.आज भी है,लेकिन अब कुछ हद तक टूटा है और वहाँ जिस तरह की मानसिकता करवट ले रही है,उस आलोक मे शनैः-शनैः टूटते जाने के आसार दिख रहे है.यदि हम बिहार की पत्रकारिता की नजर से देखे तो उस समय सर्वाधिक प्रसार वाले दैनिक हिनुस्तान ने अपनी बुलन्दी बरकरार रखने हेतु उक्त विक्रीति को खूब बढावा दिया था.यह बात दीगर है कि समय के साथ दैनिक हिन्दुस्तान की बादशाहियत को कई समाचार-पत्र ज्यो-ज्यो तोड रहे है,त्यो-त्यो उस तरह के कुप्रचारो पर भी अंकुश लगता दिख रहा है.इस अखबार के लिये कभी मै मुजफ्फरपुर से लालूजी की जातिवादी-वर्गवादी राजनीति के दौर मे समचार संकलण,लेखन संप्रेषण का कार्य करता था.चुनावो मे निर्देशानुसार क्षेत्र की जातिवार और वर्गवार मतदाता का झुकाव उम्मीदवारो के प्रति होने की खबरे मुहैया करानी पडती थी.चाहे स्थिति कुछ भी हो.वहरहाल,रांची (झारखंड)से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान भी अपनी साख बढाने की दिशा मे ठीक वैसा ही तेवर अपनाता दिख रहा है,जैसा कि कभी बिहार मे था.आप संलग्न कतरन मात्र से समझ सकते है कि आखिर इस तरह के भ्रामक खबरो को प्रमुखता से प्रसारित करना कितना जनहित मे है?

सोमवार, 4 जनवरी 2010

उग्रवाद:झारखंड के मुखिया शिबू सोरेन की गलतफहमी न.2

झारखंड मे नक्सलवाद कोई समस्या नही है.इसमे शामिल सब गांव का छोकडा लोग है.मीडिया मे बात का बतंगड बनाया जा रहा है.

वेशक झारखंड के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने शिबू सोरेन का इरादा झारखंड को अपने सपनो के अनुरूप ढालना है.वे चाहते है कि उनकी सरकार उन वेवश लाचार लोगों तक ईमानदारी से पहुंचे,जिनकी गोद मे वे पले--बढे है. और एक अच्छा नेता भी वही होता है,जो अपने जमीन के दुःख दर्द को समझे तथा उस दिशा मे सार्थक पहल ही न करे अपितु ठोस कारगर कदम उठाये.लेकिन आदिवासियो के एक बडे तबके मे "दिशोम गुरू", मीडिया की नज़र मे "गुरूजी" तथा विरोधियो की जुबान पर "गुरूघंटाल" के नाम से चर्चित झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया,जो अब भाजपा और आजसू के सहयोग से प्रांत का मुखिया बन गये है,उन्होने पदभार संभालते ही जिस तरह के सोच प्रकट की है,उसका अवलोकन करने से मात्र यही स्पष्ट होता है कि विशुद्ध ग्रामीण परिवेश की राजनीति करने वाला यह नेता अनेक गलतफहमियो का शिकार है.जिसे दूर किये वगैर झारखंड जैसे बदहाल प्रांत का विकास संभव ही नही है.आईये हम बात करते है मुख्यमंत्री शिबू सोरेन उर्फ गुरूजी की गलतफहमी न.2 की. गुरूजी का साफ कहना है कि झारखंड मे नक्सलवाद कोई समस्या नही है. इसे बडी समस्या बनाया गया है. इसमे शामिल सब गांव का छोकडा लोग है.मीडिया मे बात का बतंगड बनाया जा रहा है.बकौल मुख्यमंत्री शिबू सोरेन किसी के घर मे किसी ने जान मार दी,उसके बदले की कार्रवाई मे हिंसा कर बैठता है. इसी का नाम उग्रवाद दे दिया गया है.वेशक इस तरह की स्पष्ट सोच के पीछे गुरूजी के ईरादे कुछ भी रहे हो.लेकिन जिस तरह की उग्रवाद की बात कर रहे है,झारखंड जैसे राज्य मे उस्की ताजा स्थिति कुछ अलग ही तस्वीर लिये हुये है.यदि वे आज भी अपने जवानी काल के उग्रवादी अनुभव का आंकलन समेटे समाधान ढूंढ रहे है तो उनकी यह बहुत बड़ी गलतफहमी है.पुलिस--प्रशासन का मनोबल तोडने वाला है.क्योंकि आज का उग्रवादी उनके जैसा तीर--धनुष लिये हुये लुक्का--छिपी का खेल नही खेल रहा है अपितु ए.के.47,आरडीएक्स,डाईनामाईट सहित अत्याधुनिक सेटेलाईट उपकरणो से लैस है और समुचे शासन--तंत्र पर भारी पड रहा है. गुरूजी को यह भी नही भूलना चाहिये कि स्कूलो,सामुदायिक भवनो,रेल स्टेशनो--पटरियो को उडाना और राज्य के विकास कार्यो से जुडे सरकारी गैर सरकारी कर्मियो तो दूर राजनीतिक दलो से भारी भरकम "लेवी" वसूलना आखिर क्या है? ऐसे मे गुरूजी सरीखे प्रांत के मुखिया की इस तरह मानसिकता फिलहाल एक तरह से उग्रवादियो के सामने संवैधानिक संस्थाओ द्वारा घुटने टिकवाने की मानी जा रही है और खुद के उग्रवादी अनुभवो के सहारे उग्रवाद की ताजा स्थिति का आंकलन और उसका समाधान ढूंढना एक गलतफहमी है भी

झारखण्ड की बदहाली के लिये बिहारियो को दोषी मानते है शिबू सोरेन

शिबू सोरेन की गलतफहमी .1

वेशक झारखंड के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने शिबू सोरेन का इरादा झारखंड को अपने सपनो के अनुरूप ढालना है.वे चाहते है कि उनकी सरकार उन वेवश लाचार लोगों तक ईमानदारी से पहुंचे,जिनकी गोद मे वे पले-बढे है. और एक अच्छा नेता भी वही होता है,जो अपने जमीन के दुःख दर्द को समझे तथा उस दिशा मे सार्थक पहल ही करे अपितु ठोस कारगर कदम उठाये.लेकिन आदिवासियो के एक बडे तबके मे दिशोम गुरू, मीडिया की नज़र मे गुरूजी तथा विरोधियो की जुबान पर गुरूघंटाल के नाम से चर्चित झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया,जो अब भारतीय जनता पार्टी और आजसू के सहयोग से प्रांत का मुखिया बन गये है,उन्होने पदभार संभालते ही जिस तरह के सोच प्रकट की है,उसका अवलोकन करने से मात्र यही स्पष्ट होता है कि विशुद्ध ग्रामीण परिवेश की राजनीति करने वाला यह नेता अनेक गलतफहमियो का शिकार है.जिसे दूर किये वगैर झारखंड जैसे बदहाल प्रांत का विकास संभव ही नही है.आईये हम बात करते है मुख्यमंत्री शिबू सोरेन उर्फ गुरूजी की गलतफहमी .1की.गुरूजी का कहना है कि झारखंड की ताजा बदहाली के लिये बरकरार बिहारी शासन व्यवस्था है,बिहारी कल्चर है.जब तक समुचा शासन-तंत्र उनके लोगों का नही होगा,तब तक झारखंड मे कोए कार्य नही दिखेगा. गुरूजी ने प्रायः सभी समाचार पत्रो को कल दिये अपने ताजा साक्षात्कार मे कही है. हम नही समझते कि गुरूजी के दिलोदिमाग मे कायम इस तरह की मनसिकता से झारखंड का कुछ भी भला हो सकता है.एक सर्वेक्षण रिपोर्ट बताता है कि बिहार से अलग झारखण्ड राज्य गठन के बाद से लेकर इन नौ वर्षो मे शासन-तंत्र के भीतर यहाँ सब कुछ बदल गया है.ग्रामीण शासन व्यव्स्था के तहत सारे ग्राम प्रधान अदिवासियो के लिये आरक्षित है और सारा संचालन उन्ही के हाथो मे है. अभी तक राज्य के जितने भी मुखिया हुये है,सब आदिवासी समुदाय के लोग ही हुये है. राज्य के आला अधिकारी या कर्मचारी भी करीव 66% की तादात मे झारखंडी लोग ही काबिज है.ऐसे मे बिहारी मानसिकता का कयम सवाल उठाना गुरूजी के लिये कितना उचित है, यहाँ एक बहस का मुद्दा हो सकता है.क्योंकि गुरूजी अब आम नेता नही बल्कि,राज्य के मुखिया है.जहाँ तक बिहारी मानसिकता का सवाल है तो शायद गुरूजी यह भूल रहे है कि अब बिहार और बिहारी मानसिकता तेजी से बदल गई है.अब तो पहले जैसा बिहार है और ही पहले जैसी बिहारी मानसिकता. कभी भय,भुख भ्रष्टाचार का पर्याय रहा बिहार अब सुख-चैन की बंशी बजाने लगा है. जहाँ राष्ट्रीय विकास दर 8.02% है,वही बिहार का विकास दर 10.30% है. कही सुखाड तो कही बाढ का दंश झेलने के बाबजूद आज देश का दूसरा विकसित राज्य बन गया है.यहाँ परिवर्तन पिछले चार सालो के भीतर आया है,जिस अंतराल मे झारखंड की दुर्गति हुई है.